श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 14: विश्व व्यवस्था की पद्धति  »  श्लोक 6

 
श्लोक
पालयन्ति प्रजापाला यावदन्तं विभागश: ।
यज्ञभागभुजो देवा ये च तत्रान्विताश्च तै: ॥ ६ ॥
 
शब्दार्थ
पालयन्ति—आदेश पूरा करते हैं; प्रजा-पाला:—विश्व के शासक, अर्थात् मनु के पुत्र तथा पौत्र; यावत् अन्तम्—मनु के शासन के अन्त तक; विभागश:—विभागों में; यज्ञ-भाग-भुज:—यज्ञों के फल के भोक्ता; देवा:—देवतागण; ये—अन्य; च—भी; तत्र अन्विता:—उस काम में लगे हुए; च—भी; तै:—उनके द्वारा ।.
 
अनुवाद
 
 यज्ञों के फलों का भोग करने के लिए विश्व के शासक, अर्थात् मनु के पुत्र तथा पौत्र, मनु के शासन काल के अन्त तक भगवान् के आदेशों का पालन करते हैं। देवता भी इन यज्ञों के फलों में भाग प्राप्त करते हैं।
 
तात्पर्य
 जैसाकि भगवद्गीता (४.२) में कहा गया है—
एवं परम्पराप्राप्तम् इमं राजर्षयो विदु: “यह परम विज्ञान परम्परा शृंखला से होकर प्राप्त किया गया और राजर्षियों ने इसे उसी प्रकार से समझा।” यह परम्परा प्रणाली मनु से इक्ष्वाकु और इक्ष्वाकु से उसके पुत्र-पौत्रों तक चलती है। विश्व के शासक परम्परा-पद्धति में भगवान् के आदेशों का पालन करते हैं। जो कोई शान्तिपूर्ण जीवन बिताना चाहता है उसे इस परम्परा प्रणाली में भाग लेकर यज्ञ करने चाहिए। हमें श्री चैतन्य महाप्रभु की गौडीय वैष्णव परम्परा की भाँति सारे विश्व में संकीर्तन यज्ञ करने चाहिए (यज्ञै: सङ्कीर्तनप्रायैर्यजन्ति हि सुमेधस:)। श्री चैतन्य महाप्रभु इस कलिकाल में भगवान् के अवतार हैं। यदि सारे विश्व में तेजी के साथ सङ्कीर्तन आन्दोलन फैलाया जाए है, तो वे आसानी से तुष्ट किये जा सकेंगे। इससे लोग सुखी भी बनेंगे; इसमें कोई सन्देह नहीं है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥