श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 14: विश्व व्यवस्था की पद्धति  » 
 
 
 
संक्षेप विवरण
 
 इस अध्याय में मनु के लिए भगवान् द्वारा नियत कर्तव्यों का वर्णन हुआ है। सारे मनु तथा उन सबके पुत्र, ऋषि, देवता और इन्द्र भी भगवान् के विभिन्न अवतारों के आदेशों के अनुसार कार्य करते हैं। प्रत्येक चतुर्युग में सत्ययुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग तथा कलियुग आते हैं और प्रत्येक चतुर्युग के अन्त में भगवान् के आदेशानुसार कर्म करने वाले ऋषिगण वैदिक ज्ञान का वितरण करके शाश्वत धार्मिक नियमों की पुन:स्थापना करते हैं। मनु का कर्तव्य धर्म की पद्धति को पुन:स्थापित करना है। मनु के पुत्र उसके आदेशों का पालन करते हैं और इस प्रकार सारा विश्व मनु तथा उसकी सन्तानों द्वारा पालित होता है। इन्द्रगण स्वर्गलोकों के विभिन्न शासक हैं। वे देवताओं की सहायता से तीनों
लोकों पर शासन चलाते हैं। भगवान् भी विभिन्न युगों में अवतार के रूप में प्रकट होते हैं। वे सनक, सनातन, याज्ञवल्क्य, दत्तात्रेय तथा अन्यों के रूप में प्रकट होते हैं और आध्यात्मिक ज्ञान, कर्तव्य, योग वे सिद्धान्तों इत्यादि के विषय में उपदेश देते हैं। वे मरीचि इत्यादि के रूप में सन्तानें उत्पन्न करते हैं; राजा के रूप में वे दुष्टों को दण्ड देते हैं और काल के रूप में वे सृष्टि का संहार करते हैं। कोई तर्क कर सकता है कि, “यदि सर्वशक्तिमान भगवान् मात्र अपनी इच्छा से ही सब कुछ कर सकते हैं, तो फिर उन्होंने इतने महापुरुषों को व्यवस्था का भार क्यों दे रखा है?” जो लोग माया के वश में हैं, वे यह नहीं समझ सकते हैं कि भगवान् किस तरह और क्यों ऐसा करते हैं।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥