श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 15: बलि महाराज द्वारा स्वर्गलोक पर विजय  »  श्लोक 31

 
श्लोक
एष विप्रबलोदर्क: सम्प्रत्यूर्जितविक्रम: ।
तेषामेवापमानेन सानुबन्धो विनङ्‌क्ष्यति ॥ ३१ ॥
 
शब्दार्थ
एष:—यह (बलि महाराज); विप्र-बल-उदर्क:—अपने में निहित ब्राह्मण शक्ति के कारण उन्नति करने वाला; सम्प्रति—इस समय; ऊर्जित-विक्रम:—अत्यन्त शक्तिशाली; तेषाम्—उन्हीं ब्राह्मणों के; एव—निस्सन्देह; अपमानेन—अपमान से; स- अनुबन्ध:—अपने मित्रों तथा सहायकों सहित; विनङ्क्ष्यति—विनष्ट हो जायेगा ।.
 
अनुवाद
 
 इस समय बलि ब्राह्मणों द्वारा प्रदत्त आशीषों के कारण अत्यन्त शक्तिशाली बन गया है, किन्तु बाद में जब वह इन्हीं ब्राह्मणों का अपमान करेगा तो वह अपने मित्रों तथा सहायकों सहित विनष्ट हो जायेगा।
 
तात्पर्य
 बलि महाराज तथा इन्द्र परस्पर शत्रु थे। अतएव जब देवताओं के गुरु बृहस्पति ने भविष्यवाणी की कि जिन ब्राह्मणों की कृपा से बलि महाराज इतने प्रबल हुए थे उनका अपमान करने पर वे विनष्ट हो जायेंगे तो बलि महाराज के शत्रु सचमुच यह जानने के लिए उत्सुक हो गए कि यह उपयुक्त क्षण कब आयेगा। इन्द्र को शान्त करने के लिए बृहस्पति ने उसे विश्वास दिलाया कि वह समय अवश्य आयेगा क्योंकि बृहस्पति यह देख सकते थे कि भविष्य में बलि महाराज होते वामनदेव के रूप में भगवान्
विष्णु को शान्त करने के लिए शुक्राचार्य के आदेशों का उल्लंघन करेंगे। निस्सन्देह, कृष्णभावनामृत में अग्रसर होने के लिए भक्त सारे संकटों को मोल ले सकता है। वामनदेव को प्रसन्न करने के लिए बलि महाराज ने अपने गुरु शुक्राचार्य के आदेशों का उल्लंघन करने का संकट उठाया। इसके कारण उन्हें अपनी सारी सम्पत्ति खोनी पड़ी, किन्तु भगवान् की भक्ति के कारण उन्हें आशा से अधिक लाभ हुआ और भविष्य में आठवें मन्वन्तर में वे इन्द्र के सिंहासन पर पुन: आसीन हुए।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥