श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 16: पयोव्रत पूजा विधि का पालन करना  »  श्लोक 19

 
श्लोक
क्‍व देहो भौतिकोऽनात्मा क्‍व चात्मा प्रकृते: पर: ।
कस्य के पतिपुत्राद्या मोह एव हि कारणम् ॥ १९ ॥
 
शब्दार्थ
क्व—कहाँ है; देह:—यह भौतिक शरीर; भौतिक:—पाँच तत्त्व से बना; अनात्मा—जो आत्मा नहीं है; क्व—कहाँ है; च—भी; आत्मा—आत्मा; प्रकृते:—भौतिक जगत के प्रति; पर:—दिव्य; कस्य—किसका; के—कौन है; पति—पति; पुत्र-आद्या:— अथवा पुत्र इत्यादि; मोह:—मोह; एव—निस्सन्देह; हि—निश्चय ही; कारणम्—कारण ।.
 
अनुवाद
 
 कश्यपमुनि ने आगे कहा : यह पाँच तत्त्वों से बना भौतिक शरीर है क्या? यह आत्मा से भिन्न है। निस्सन्देह, आत्मा उन भौतिक तत्त्वों से सर्वथा भिन्न है जिनसे यह शरीर बना हुआ है। किन्तु शारीरिक आसक्ति के कारण ही किसी को पति या पुत्र माना जाता है। ये मोहमय सम्बन्ध अज्ञान के कारण उत्पन्न होते हैं।
 
तात्पर्य
 आत्मा या जीव निश्चय ही शरीर से भिन्न है, जो पाँच भौतिक तत्त्वों का मेल है। यह सीधा-सादा तथ्य है, किन्तु यह तब तक समझ में नहीं आता जब तक किसी को आध्यात्मिक शिक्षा प्राप्त न हो। कश्यपमुनि अपनी पत्नी से स्वर्गलोक में मिले थे, किन्तु सारे ब्रह्माण्ड में तथा इस पृथ्वी पर भी यही एक भ्रान्त धारणा फैली हुई है। जीवों की विभिन्न कोटियाँ होती हैं, किन्तु उनमें से लगभग सभी देहात्मबुद्धि के वशीभूत होते हैं। दूसरे शब्दों में, इस भौतिक संसार के सारे जीव आध्यात्मिक शिक्षा से न्यूनाधिक विहीन होते हैं। किन्तु वैदिक सभ्यता तो आध्यात्मिक शिक्षा पर टिकी है और यही आध्यात्मिक शिक्षा वह विशेष मूलाधार है, जिस पर अर्जुन से भगवद्गीता का प्रवचन किया गया था। भगवद्गीता के प्रारम्भ में कृष्ण अर्जुन को यह समझने का उपदेश देते हैं कि आत्मा शरीर से भिन्न है— देहिनोऽस्मिन यथा देहे कौमारं यौवनं जरा।
तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति ॥

“जिस तरह देहधारी आत्मा इस शरीर में बचपन से युवावस्था तथा फिर वृद्धावस्था में जाता है उसी तरह मृत्यु के समय आत्मा किसी दूसरे शरीर में चला जाता है। आत्मसिद्ध जीव ऐसे परिवर्तन से मोह-ग्रस्त नहीं होता।” (भगवद्गीता २.१३)। दुर्भाग्यवश आधुनिक मानव सभ्यता में इस आध्यात्मिक शिक्षा का नितान्त अभाव है। कोई भी अपने असली हित को नहीं समझता जो भौतिक देह में नहीं अपितु आत्मा में निहित रहता है। शिक्षा का अर्थ है आध्यात्मिक शिक्षा। आध्यात्मिक शिक्षा के बिना देहात्मबुद्धि में रहकर कठिन श्रम करना पशु के समान जीवन बिताना है। नायं देहो देहभाजां नृलोके कष्टान् कामानर्हते विड्भुजां ये (भागवत ५.५.१)। लोग आत्मा के बारे में शिक्षा की परवाह न करते हुए केवल शारीरिक सुविधाओं के लिए कठिन श्रम करते हैं। इस प्रकार वे अत्यन्त संकटाकीर्ण सभ्यता में रह रहे हैं क्योंकि यह तथ्य है कि आत्मा को एक शरीर से दूसरे में देहान्तर करना होता है (तथा देहान्तरप्राप्ति:)। आध्यात्मिक शिक्षा के बिना लोग अंधकार में रहते हैं और वे यह नहीं जानते कि इस देह के विनष्ट होने पर उनका क्या होगा। वे अन्धे बनकर काम करते हैं और अन्धे नेता ही उनका मार्गदर्शन करते हैं। अन्धा यथान्धैरुपनीयमानास्तेऽपीशतन्त्र्मा् उरुदाम्नि बद्धा: (भागवत ७.५.३१)। मूर्ख व्यक्ति यह नहीं जानता कि वह पूरी तरह भौतिक प्रकृति के बन्धन में है और मृत्यु के बाद प्रकृति उस पर एक विशेष प्रकार की देह थोपेगी जिसे उसे स्वीकार करना होगा। वह यह नहीं जानता कि भले ही इस वर्तमान शरीर में वह अत्यन्त महत्त्वपूर्ण व्यक्ति क्यों न हो, किन्तु हो सकता है कि अगले जन्म में उसे प्रकृति के गुणों अन्तर्गत अपने कार्यों से अज्ञान के कारण पशु या वृक्ष का शरीर धारण करना पड़े। अतएव कृष्णभावनामृत आन्दोलन सारे जीवों को आध्यात्मिक शरीर का असली ज्ञान प्रदान करने का प्रयास कर रहा है। इस आन्दोलन को समझ पाना कठिन नहीं है और लोगों को चाहिए कि इसका लाभ उठायें क्योंकि यह उन्हें अनुत्तरदायित्वपूर्ण संकटमय जीवन से बचा लेगा।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥