श्रीमद् भागवतम
शब्द आकार

भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 16: पयोव्रत पूजा विधि का पालन करना  »  श्लोक 21

 
श्लोक
स विधास्यति ते कामान्हरिर्दीनानुकम्पन: ।
अमोघा भगवद्भ‍क्तिर्नेतरेति मतिर्मम ॥ २१ ॥
 
शब्दार्थ
स:—वह (वासुदेव); विधास्यति—निश्चय ही पूरा करेगा; ते—तुम्हारी; कामान्—इच्छाएँ; हरि:—भगवान्; दीन—दुखिया पर; अनुकम्पन:—अत्यन्त कृपालु; अमोघा—अच्युत; भगवत्-भक्ति:—भगवान् की भक्ति; न—नहीं; इतरा—भगवद्भक्ति के अतिरिक्त कुछ भी; इति—इस प्रकार; मति:—अभिमत; मम—मेरा ।.
 
अनुवाद
 
 दीनों पर अत्यन्त दयालु भगवान् तुम्हारी सारी इच्छाओं को पूरा करेंगे क्योंकि उनकी भक्ति अच्युत है। भक्ति के अतिरिक्त अन्य सारी विधियाँ व्यर्थ हैं। ऐसा मेरा मत है।
 
तात्पर्य
 मनुष्य तीन प्रकार के होते हैं—अकाम, मोक्षकाम तथा सर्वकाम। जो इस जगत से मोक्ष पाना चाहता है, वह मोक्षकाम है; जो इस जगत का पूरा-पूरा भोग करना चाहता हे वह सर्वकाम कहलाता है, किन्तु जिसने सारी इच्छाएँ पहले ही पूरी कर ली हैं और अब जिसे कोई भौतिक इच्छा नहीं सताती वह अकाम कहलाता है। भक्त को कोई इच्छा नहीं होती। सर्वोपाधि विनिर्मुक्तं तत्परत्वेन निर्मलम्। वह शुद्ध है और भौतिक इच्छाओं से मुक्त होता है। मोक्षकामी परब्रह्म में विलीन होकर मोक्ष प्राप्त करना चाहता है अतएव ब्रह्म में विलीन होने की इस इच्छा के कारण वह अभी शुद्ध नहीं हुआ होता और जहाँ मोक्षकामी ही अशुद्ध हों वहाँ कर्मियों के विषय में क्या कहा जाये जिन्हें अनेक इच्छाओं की पूर्ति करनी होती है? फिर भी शास्त्रों का कथन है—
अकाम: सर्वकामो वा मोक्षकाम उदारधी:।

तीव्रेण भक्तियोगेन यजेत पुरुषं परम् ॥

“चाहे कोई सब कुछ चाहता हो या कुछ भी न चाहता हो या वह भगवान् में विलीन होने की इच्छा करता हो, वह बुद्धिमान् तभी है यदि वह दिव्य प्रेमाभक्ति द्वारा भगवान् कृष्ण की पूजा करता है” (भागवत २.३.१०)।

कश्यपमुनि ने देखा कि उनकी पत्नी अदिति में अपने पुत्रों के भौतिक कल्याण के लिए कुछ इच्छाएँ हैं फिर भी उन्होंने उन्हें भगवान् की भक्ति करने की सलाह दी। दूसरे शब्दों में, चाहे कोई कर्मी हो या ज्ञानी अथवा योगी हो या भक्त, उसे सदा वासुदेव के चरणकमलों की शरण ग्रहण करनी चाहिए और उनकी दिव्य प्रेमाभक्ति करनी चाहिए जिससे उसकी सारी इच्छाएँ पूरी हो सकें। कृष्ण दीन- अनुकम्पन हैं—वे सब पर परम दयालु रहते हैं। अतएव यदि कोई अपनी भौतिक इच्छाएँ पूरी करना चाहता है, तो कृष्ण उसकी सहायता करते हैं। निस्सन्देह, यदि भक्त अत्यन्त निष्ठावान् होता है, तो भगवान् कभी कभी उस पर विशेष कृपा करके उसकी भौतिक इच्छाएँ पूरी करने से इनकार कर देते हैं और सीधे उसे अनन्य शुद्ध भक्ति का आशीर्वाद देते हैं। चैतन्यचरितामृत में (आदि २२.३८-३९) कहा गया है—

कृष्ण कहे—‘आमा भजे, मागे विषय-सुख अमृत छाडि’ विष मागे—एइ बड़ मूर्ख आमि—विज्ञ, एइ मूर्खे ‘विषय’ केने दिब? स्वचरणामृत दिया ‘विषय’ भुलाइब कृष्ण कहते हैं “यदि कोई मेरी दिव्य प्रेमा-भक्ति में लगा रहकर साथ ही भौतिक भोग का ऐश्वर्य चाहता है, तो वह बहुत बड़ा मूर्ख है। वह निस्सन्देह ऐसे पुरुष के तुल्य है, जो विषपान करने के लिए अमृत छोड़ देता है। चूँकि मैं अत्यन्त बुद्धिमान् हूँ अतएव मैं इस मूर्ख को भौतिक सम्पन्नता क्यों दूँ? मैं तो उसे अपने चरणकमलों की शरण का अमृत ग्रहण करने तथा मोहमय भौतिक भोग को भूलने के लिए प्रेरित करूँगा।” यदि भक्त किसी भौतिक इच्छा के साथ-साथ कृष्ण के चरणकमलों में निष्ठापूर्वक अपने मन को लगाना चाहता है, तो कृष्ण उसे सीधे शुद्ध भक्ति प्रदान कर सकते हैं और उसकी सारी भौतिक इच्छाओं तथा सम्पत्ति को हर सकते हैं। यह भक्तों के प्रति भगवान् का विशेष अनुग्रह होता है। अन्यथा यदि कोई कृष्ण की भक्ति करता है, किन्तु फिर भी भौतिक इच्छाएँ पूरी करना चाहता है, तो वह ध्रुव महाराज के ही समान सारी भौतिक इच्छाओं से मुक्त हो सकता है, किन्तु इसमें कुछ समय लग सकता है किन्तु यदि कोई निष्ठावान् भक्त मात्र कृष्ण के चरणकमलों को चाहता है, तो कृष्ण उसे शुद्धभक्ति प्रदान करते हैं।

____________________________
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥