श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 16: पयोव्रत पूजा विधि का पालन करना  »  श्लोक 40

 
श्लोक
श‍ृतं पयसि नैवेद्यं शाल्यन्नं विभवे सति ।
ससर्पि: सगुडं दत्त्वा जुहुयान्मूलविद्यया ॥ ४० ॥
 
शब्दार्थ
शृतम्—पकाया गया; पयसि—दूध में; नैवेद्यम्—अर्चाविग्रह को भेंट; शालि-अन्नम्—चावल; विभवे—यदि उपलब्ध हो; सति—इस प्रकार से; स-सर्पि:—घी के साथ; स-गुडम्—गुड़ के साथ; दत्त्वा—उन्हें प्रदान करके; जुहुयात्—अग्नि में आहुतियाँ डाले; मूल-विद्यया—उसी द्वादशाक्षर मंत्र के उच्चारण के साथ-साथ ।.
 
अनुवाद
 
 यदि सामर्थ्य हो तो भक्त अर्चाविग्रह पर दूध में घी तथा गुड़ के साथ पकाये चावल चढ़ाए। उसी मूल मंत्र का उच्चारण करते हुए यह सामग्री अग्नि में डाली जाये।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥