श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 16: पयोव्रत पूजा विधि का पालन करना  »  श्लोक 51-52

 
श्लोक
पूजां च महतीं कुर्याद् वित्तशाठ्यविवर्जित: ।
चरुं निरूप्य पयसि शिपिविष्टाय विष्णवे ॥ ५१ ॥
सूक्तेन तेन पुरुषं यजेत सुसमाहित: ।
नैवेद्यं चातिगुणवद् दद्यात्पुरुषतुष्टिदम् ॥ ५२ ॥
 
शब्दार्थ
पूजाम्—पूजा; च—भी; महतीम्—अत्यन्त तडक़-भडक़ वाला; कुर्यात्—करे; वित्त-शाठ्य—कंजूसी की मनोवृत्ति; विवर्जित:—त्यागकर; चरुम्—यज्ञ में डाला गया अन्न; निरूप्य—ठीक से देखकर; पयसि—दूध के साथ; शिपिविष्टाय— प्रत्येक जीव के हृदय में स्थित परमात्मा को; विष्णवे—विष्णु को; सूक्तेन—पुरुष-सूक्त नामक वैदिक मंत्रोच्चार से; तेन—उसके द्वारा; पुरुषम्—भगवान् की; यजेत—पूजा करे; सु-समाहित:—मनोयोग से; नैवेद्यम्—अर्चाविग्रह को चढ़ाया गया भोजन; च—तथा; अति-गुण-वत्—समस्त सुस्वादु व्यंजन; दद्यात्—प्रदान करे; पुरुष-तुष्टि-दम्—भगवान् को अत्यन्त प्रसन्न करने वाली प्रत्येक वस्तु ।.
 
अनुवाद
 
 धन न खर्च करने की कंजूसी की आदत छोडक़र अन्तर्यामी भगवान् विष्णु की भव्य पूजा का आयोजन करे। मनुष्य को चाहिए कि वह अत्यन्त मनोयोग से घी में पकाये अन्न तथा दूध से आहुति (हव्य) तैयार करे और पुरुष-सूक्त मंत्रोच्चार करे और विविध स्वादों वाले भोजन भेंट करे। इस प्रकार मनुष्य को भगवान् का पूजन करना चाहिए।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥