श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 17: भगवान् को अदिति का पुत्र बनना स्वीकार  »  श्लोक 1

 
श्लोक
श्रीशुक उवाच
इत्युक्ता सादिती राजन्स्वभर्त्रा कश्यपेन वै ।
अन्वतिष्ठद् व्रतमिदं द्वादशाहमतन्द्रिता ॥ १ ॥
 
शब्दार्थ
श्री-शुक: उवाच—श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; इति—इस प्रकार; उक्ता—कहे जाने पर; सा—उस; अदिति:—अदिति ने; राजन्—हे राजा; स्व-भर्त्रा—अपने पति; कश्यपेन—कश्यपमुनि से; वै—निस्सन्देह; अनु—इसी प्रकार से; अतिष्ठत्—सम्पन्न किया; व्रतम् इदम्—इस पयोव्रत को; द्वादश-अहम्—बारह दिनों तक; अतन्द्रिता—बिना आलस्य के ।.
 
अनुवाद
 
 शुकदेव गोस्वामी ने कहा : हे राजा! इस प्रकार अपने पति कश्यपमुनि से दिए जाने पर अदिति ने बिना आलस्य के उनके आदेशों का दृढ़ता से पालन किया और पयोव्रत अनुष्ठान सम्पन्न किया।
 
तात्पर्य
 किसी भी प्रकार की उन्नति के लिए, विशेषतया आध्यात्मिक जीवन में, गुरु के प्रामाणिक आदेशों का दृढ़तापूर्वक पालन करना होता है। अदिति ने ऐसा किया। उन्होंने अपने पति तथा गुरु के आदेशों का दृढ़ता से पालन किया। जैसी कि वैदिक आदेशों में पुष्टि हुई है—यस्य देवे परा भक्तिर्यथा देवे तथा गुरौ—मनुष्य को गुरु
पर पूर्ण श्रद्धा रखनी चाहिए जो शिष्य के आध्यात्मिक जीवन की प्रगति में सहायक होता है। जब शिष्य स्वतंत्र रूप से सोचने लगता है और गुरु के आदेशों की परवाह नहीं करता तो वह असफल हो जाता है (यस्याप्रसादान् न गति: कुतोऽपि)। अदिति ने अपने पति तथा गुरु के आदेशों का दृढ़ता से पालन किया और इस तरह वे सफल हुईं।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥