श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 17: भगवान् को अदिति का पुत्र बनना स्वीकार  »  श्लोक 10

 
श्लोक
आयु: परं वपुरभीष्टमतुल्यलक्ष्मी-
र्द्योभूरसा: सकलयोगगुणास्त्रिवर्ग: ।
ज्ञानं च केवलमनन्त भवन्ति तुष्टात्
त्वत्तो नृणां किमु सपत्नजयादिराशी: ॥ १० ॥
 
शब्दार्थ
आयु:—आयु; परम्—ब्रह्मा के समान दीर्घ; वपु:—विशेष प्रकार का शरीर; अभीष्टम्—जीवन लक्ष्य; अतुल्य-लक्ष्मी:—जगत में अद्वितीय ऐश्वर्य; द्यो—स्वर्गलोक; भू—भूलोक; रसा:—अधोलोक; सकल—सभी प्रकार के; योग-गुणा:—आठ यौगिक सिद्धियाँ; त्रि-वर्ग:—धर्म, अर्थ तथा काम; ज्ञानम्—ज्ञान; च—तथा; केवलम्—पूर्ण; अनन्त—हे अनन्त; भवन्ति—सम्भव बन जाते हैं; तुष्टात्—आपकी तुष्टि से; त्वत्त:—आपसे; नृणाम्—सभी जीवों को; किम् उ—क्या कहा जाये; सपत्न—शत्रु; जय— जीत; आदि:—इत्यादि; आशी:—ऐसे आशीष या वर ।.
 
अनुवाद
 
 हे अनन्त! यदि आप प्रसन्न हैं, तो मनुष्य को ब्रह्मा जैसी दीर्घायु, उच्च, मध्य या निम्नलोक में शरीर, असीम भौतिक ऐश्वर्य, धर्म, अर्थ तथा इन्द्रियतोष, पूर्ण दिव्यज्ञान तथा आठों योगसिद्धियाँ बड़ी आसानी से प्राप्त हो सकती हैं। अपने प्रतिद्वंद्वियों पर विजय प्राप्त करने की बात करना तो अत्यन्त नगण्य उपलब्धि है।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥