श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 17: भगवान् को अदिति का पुत्र बनना स्वीकार  »  श्लोक 14

 
श्लोक
इन्द्रज्येष्ठै: स्वतनयैर्हतानां युधि विद्विषाम् ।
स्त्रियो रुदन्तीरासाद्य द्रष्टुमिच्छसि दु:खिता: ॥ १४ ॥
 
शब्दार्थ
इन्द्र-ज्येष्ठै:—जिन व्यक्तियों में इन्द्र सबसे बड़ा है; स्व-तनयै:—अपने पुत्रों द्वारा; हतानाम्—जो मारे जा चुके हैं; युधि—युद्ध में; विद्विषाम्—शत्रुओं की; स्त्रिय:—पत्नियाँ; रुदन्ती:—विलाप करती; आसाद्य—अपने-अपने पतियों के शवों के निकट आकर; द्रष्टुम् इच्छसि—देखना चाहती हो; दु:खिता:—अत्यन्त दुखित ।.
 
अनुवाद
 
 तुम अपने पुत्रों के शत्रु उन असुरों की पत्नियों को अपने-अपने पतियों की मृत्यु पर विलाप करते हुए देखना चाहती हो जब वे इन्द्रादि देवताओं द्वारा युद्ध में मारे जाएँ।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥