श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 17: भगवान् को अदिति का पुत्र बनना स्वीकार  »  श्लोक 17

 
श्लोक
अथाप्युपायो मम देवि चिन्त्य:
सन्तोषितस्य व्रतचर्यया ते ।
ममार्चनं नार्हति गन्तुमन्यथा
श्रद्धानुरूपं फलहेतुकत्वात् ॥ १७ ॥
 
शब्दार्थ
अथ—अतएव; अपि—ऐसी स्थिति के बावजूद; उपाय:—कोई साधन; मम—मेरा; देवि—हे देवी; चिन्त्य:—सोचा जाना चाहिए; सन्तोषितस्य—अत्यन्त प्रसन्न; व्रत-चर्यया—व्रत रखकर; ते—तुम्हारे द्वारा; मम अर्चनम्—मेरी पूजा करना; न—कभी नहीं; अर्हति—योग्य है; गन्तुम् अन्यथा—और व्यर्थ होने के लिए; श्रद्धा-अनुरूपम्—अपनी श्रद्धा तथा भक्ति के अनुसार; फल—फल; हेतुकत्वात्—कारण होने से ।.
 
अनुवाद
 
 हे देवी अदिति! फिर भी चूँकि मैं तुम्हारे व्रत-कार्य से प्रसन्न हुआ हूँ अतएव मुझे तुम पर कृपा करने के लिए कोई न कोई साधन खोजना होगा क्योंकि मेरी पूजा कभी भी व्यर्थ नहीं जाती, प्रत्युत पात्रता के अनुरूप वाँछित फल देने वाली होती है।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥