श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 17: भगवान् को अदिति का पुत्र बनना स्वीकार  »  श्लोक 23

 
श्लोक
सोऽदित्यां वीर्यमाधत्त तपसा चिरसम्भृतम् ।
समाहितमना राजन्दारुण्यग्निं यथानिल: ॥ २३ ॥
 
शब्दार्थ
स:—कश्यप ने; अदित्याम्—अदिति के भीतर; वीर्यम्—वीर्य; आधत्त—रख दिया; तपसा—तपस्या द्वारा; चिर-सम्भृतम्— दीर्घकाल तक कई वर्षों से रुका हुआ; समाहित-मना:—भगवान् पर पूर्णतया समाधि लगाये; राजन्—हे राजा; दारुणि—काठ में; अग्निम्—अग्नि; यथा—जिस तरह; अनिल:—वायु ।.
 
अनुवाद
 
 हे राजा! जिस तरह वायु काठ के दो टुकड़ों के बीच घर्षण को तेज करती है और अग्नि उत्पन्न कर देती है उसी तरह भगवान् में पूर्णतया ध्यानमग्न कश्यपमुनि ने अपने वीर्य को अदिति की कुक्षि में स्थानान्तरित कर दिया।
 
तात्पर्य
 जब वायु से क्षुब्ध होकर लकड़ी के दो खण्ड एक दूसरे से रगड़ खाते हैं, तो जंगल में आग लग जाती है। किन्तु वास्तव में यह अग्नि न तो लकड़ी में होती है, न वायु में; यह सदा ही दोनों से भिन्न होती है। इसी प्रकार यहाँ पर यह समझना चाहिए कि कश्यपमुनि तथा अदिति का संयोग सामान्य मानवों जैसा संभोग न था। संभोग के मानवीय स्खलन से भगवान् को कुछ भी लेना-देना नहीं रहता। वे ऐसे संसारी संयोगों से सर्वथा पृथक् रहते हैं।
भगवद्गीता (९.२९) में भगवान् कहते हैं—समोऽहं सर्वभूतेषु—मैं समस्त जीवों के प्रति समभाव रखता हूँ। तो भी भक्तों की रक्षा करने तथा उत्पात मचाने वाले असुरों का वध करने के लिए भगवान् ने अदिति की कुक्षि में प्रवेश किया। अतएव यह भगवान् की दिव्य लीला है। इसका गलत अर्थ नहीं लगाना चाहिए। किसी को यह नहीं सोचना चाहिए कि भगवान् उसी प्रकार से अदिति के पुत्र बने जिस तरह स्त्री तथा पुरुष के संभोग से एक सामान्य बालक उत्पन्न होता है।

आजकल के मत-मतान्तर के युग में यहाँ पर जीवन की उत्पत्ति के विषय में बताना उपयुक्त होगा। जीव की जीवनी शक्ति—आत्मा—मानव के वीर्य तथा रज से भिन्न है। यद्यपि बद्ध आत्मा को पुरुष तथा स्त्री की प्रजनन कोशिकाओं से कुछ भी लेना-देना नहीं रहता, वह अपने कर्म के अनुसार उचित स्थिति में रख दिया जाता है (कर्मणा दैवनेत्रेण)। इस तरह जीवन मात्र रज-वीर्य का प्रतिफल नहीं अपितु सारे भौतिक तत्त्वों से स्वतंत्र होता है। जैसाकि भगवद्गीता में भलीभाँति बताया गया है, जीव किसी भौतिक फल पर आश्रित नहीं होता। जीव को न तो अग्नि द्वारा जलाया जा सकता है, न किसी तेज हथियार से काटा जा सकता है, न जल से भिगोया जा सकता है, न ही हवा से सुखाया जा सकता है। वह भौतिक तत्त्वों से पूर्णतया स्वतंत्र होता है, किन्तु किसी श्रेष्ठ व्यवस्था द्वारा वह इन भौतिक तत्त्वों में धर दिया जाता है। वह सदा ही भौतिक सम्पर्क से पृथक् रहता है (असङ्गो ह्यं पुरुष:), किन्तु भौतिक दशा प्राप्त होने के कारण उसे प्रकृति के गुणों का बन्धन भोगना पड़ता है।

पुरुष: प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजान् गुणान्।

कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु ॥

“इस तरह जीव प्रकृति के तीनों गुणों का भोग करता हुआ जीवनयापन करता है। यह भौतिक प्रकृति की संगति के कारण होता है। इस तरह विभिन्न योनियों में उसे अच्छे-बुरे से पाला पड़ता है।” (भगवद्गीता १३.२२) यद्यपि जीव भौतिक तत्त्वों से पृथक् है, किन्तु वह भौतिक अवस्था को प्राप्त होता है और इस तरह उसे भौतिक क्रियाकलापों के फल भोगने होते हैं।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥