श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 17: भगवान् को अदिति का पुत्र बनना स्वीकार  »  श्लोक 24

 
श्लोक
अदितेर्धिष्ठितं गर्भं भगवन्तं सनातनम् ।
हिरण्यगर्भो विज्ञाय समीडे गुह्यनामभि: ॥ २४ ॥
 
शब्दार्थ
अदिते:—अदिति के गर्भ में; धिष्ठितम्—स्थापित होकर; गर्भम्—गर्भ; भगवन्तम्—भगवान् को; सनातनम्—सनातन; हिरण्यगर्भ:—ब्रह्माजी ने; विज्ञाय—यह जानकर; समीडे—स्तुति की; गुह्य-नामभि:—दिव्य नामों के साथ ।.
 
अनुवाद
 
 जब ब्रह्माजी को यह ज्ञात हो गया कि भगवान् अदिति के गर्भ में हैं, तो वे दिव्य नामों का पाठ करके भगवान् की स्तुति करने लगे।
 
तात्पर्य
 भगवान् सर्वत्र विद्यमान रहते हैं (अण्डान्तरस्थपरमाणुचयान्तरस्थम् )। अतएव जब कोई उनके दिव्य नामों का—हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे। हरे राम, हरे राम, राम राम, हरे हरे का—उच्चारण करता है, तो भगवान् ऐसे सङ्कीर्तन से स्वयमेव प्रसन्न होते हैं। ऐसा नहीं है कि भगवान् अनुपस्थित
होते हैं। वे वहाँ पर उपस्थित रहते हैं और जब भक्त दिव्य नाम का उच्चारण करता है, तो यह भौतिक ध्वनि नहीं होती। अतएव भगवान् सहज ही प्रसन्न होते हैं। भक्त जानता है कि भगवान् सर्वत्र उपस्थित हैं और वह उनके पवित्र नाम का उच्चारण करने मात्र से ही उन्हें प्रसन्न कर सकता है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥