श्रीमद् भागवतम
शब्द आकार

भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 17: भगवान् को अदिति का पुत्र बनना स्वीकार  »  श्लोक 8

 
श्लोक
श्रीअदितिरुवाच
यज्ञेश यज्ञपुरुषाच्युत तीर्थपाद
तीर्थश्रव: श्रवणमङ्गलनामधेय ।
आपन्नलोकवृजिनोपशमोदयाद्य
शं न: कृधीश भगवन्नसि दीननाथ: ॥ ८ ॥
 
शब्दार्थ
श्री-अदिति: उवाच—देवी अदिति ने कहा; यज्ञ-ईश—हे समस्त यज्ञों के नियन्ता; यज्ञ-पुरुष—सारे यज्ञों के लाभों का भोग करने वाला पुरुष; अच्युत—कभी न चूकने वाला; तीर्थ-पाद—जिनके चरणकमलों पर सारे पवित्र तीर्थस्थान स्थित हैं; तीर्थ श्रव:—समस्त सन्त पुरुषों के परम आश्रय के रूप में प्रसिद्ध; श्रवण—जिनके विषय में सुनना; मङ्गल—शुभ है; नामधेय— उनके नाम का उच्चारण करना भी शुभ है; आपन्न—शरणागत; लोक—लोगों का; वृजिन—घातक भौतिक स्थिति; उपशम— कम करते हुए; उदय—प्रकट हुआ है; आद्य—आदि भगवान्; शम्—कल्याण; न:—हमारा; कृधि—कृपया हमें प्रदान करें; ईश—हे परमनियन्ता; भगवन्—हे भगवान्; असि—तुम हो; दीन-नाथ:—दीनों के एकमात्र आश्रय ।.
 
अनुवाद
 
 देवी अदिति ने कहा : हे समस्त यज्ञों के भोक्ता तथा स्वामी, हे अच्युत तथा परम प्रसिद्ध पुरुष, जिनका नाम लेते ही मंगल का प्रसार होता है, हे आदि भगवान्, परमनियन्ता, समस्त पवित्र तीर्थस्थानों के आश्रय! आप समस्त दीन-दुखियों के आश्रय हैं और उनका कष्ट कम करने के लिए प्रकट हुए हैं। आप हम पर कृपालु हों और हमारे कल्याण का विस्तार करें।
 
तात्पर्य
 जो लोग व्रत तथा तपस्या करते हैं भगवान् उनके स्वामी हैं और वे ही उन सब को वर देते हैं। वे भक्त के लिए आजीवन पूज्य होते हैं क्योंकि वे कभी भी अपना वचन नहीं तोड़ते। जैसाकि स्वयं उन्होंने भगवद्गीता (९.३१) में कहा है—कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्त: प्रणश्यति—हे कुन्तीपुत्र! तुम इसे घोषित कर दो कि मेरा भक्त कभी भी नहीं नष्ट होता। भगवान् को यहाँ पर अच्युत कहा गया है क्योंकि वे अपने भक्तों की रक्षा करते हैं। जो भी भक्तों से शत्रुता रखता है, उसका विनाश भक्तों पर भगवान् की कृपा के कारण अवश्य होता है। चूँकि भगवान् गंगाजल के उद्गम हैं इसलिए उन्हें यहाँ तीर्थपाद कहा गया है, जिसका अर्थ है कि सारे तीर्थस्थान उनके चरणकमलों पर स्थित हैं अथवा वे अपने पाँवों से जिसे भी छूते हैं वह पवित्र
बन जाता है। उदाहरणार्थ भगवद्गीता का शुभारम्भ धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे शब्दों से होता है। चूँकि भगवान् कुरुक्षेत्र की युद्धभूमि में उपस्थित थे अतएव वह धर्मक्षेत्र अर्थात् तीर्थस्थान बन गया। अतएव परम धार्मिक पाण्डवों की विजय सुनिश्चित हो गई। कोई भी स्थान जहाँ भगवान् अपनी लीलाएँ करते हैं—यथा वृन्दावन या द्वारका—वह पवित्र बन जाता है। भगवान् के पवित्र नाम का कीर्तन—हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे। हरे राम, हरे राम, राम राम, हरे हरे—कानों को सुखद लगता है और जो भी इस कीर्तन को सुनता है उसके सौभाग्य का विस्तार होता है। भगवान् की उपस्थिति के कारण अदिति को पूरा-पूरा विश्वास था कि उसके लिए असुरों द्वारा उत्पन्न संकटमय स्थिति का अब अन्त होने वाला है।
____________________________
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥