श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 17: भगवान् को अदिति का पुत्र बनना स्वीकार  »  श्लोक 9

 
श्लोक
विश्वाय विश्वभवनस्थितिसंयमाय
स्वैरं गृहीतपुरुशक्तिगुणाय भूम्ने ।
स्वस्थाय शश्वदुपबृंहितपूर्णबोध-
व्यापादितात्मतमसे हरये नमस्ते ॥ ९ ॥
 
शब्दार्थ
विश्वाय—समस्त विश्वरूप भगवान् को; विश्व—विश्व के; भवन—सृजन; स्थिति—पालन; संयमाय—तथा संहार के लिए; स्वैरम्—पूर्णत: स्वतंत्र; गृहीत—हाथ में लेकर; पुरु—पूर्णत:; शक्ति-गुणाय—प्रकृति के तीनों गुणों को वश में रखने वाले; भूम्ने—महानतम; स्व-स्थाय—सदा आदि रूप में स्थित रहने वाले; शश्वत्—सनातन रूप से; उपबृंहित—प्राप्त किया; पूर्ण— सम्पूर्ण; बोध—ज्ञान; व्यापादित—पूर्णतया विनष्ट; आत्म-तमसे—आपकी माया; हरये—परमेश्वर; नम: ते—आपको सादर नमस्कार करता हूँ ।.
 
अनुवाद
 
 हे प्रभु! आप सर्वव्यापी विश्वरूप इस विश्व के परम स्वतंत्र स्रष्टा, पालक तथा संहारक हैं। यद्यपि आप अपनी शक्ति को पदार्थ में लगाते हैं, तो भी आप सदैव अपने आदि रूप में स्थित रहते हैं और कभी उस पद से च्युत नहीं होते क्योंकि आपका ज्ञान अच्युत है और किसी भी स्थिति के लिए सदैव उपयुक्त है। आप कभी मोहग्रस्त नहीं होते। हे स्वामी! मैं आपको सादर नमस्कार करती हूँ।
 
तात्पर्य
 चैतन्यचरितामृत (आदि २.११७) में कहा गया है—
सिद्धान्त बलिया चित्ते ना कर अलस इहा हइते कृष्णे लागे सुदृढ मानस पूर्णतया कृष्णभावनाभावित बनने के लिए प्रयत्नशील मनुष्य को चाहिए कि वह भगवान् की महिमाओं को यथासम्भव समझे। यहाँ पर अदिति इन महिमाओं की ओर संकेत कर रही हैं। यह विश्व भगवान् की बहिरंगा शक्ति के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। इसकी पुष्टि भगवद्गीता (९.४) में हुई है—मया ततमिदं सर्वम्। हम इस विश्व में जो भी देख रहे हैं वह सब भगवान् की शक्ति का प्रसार है, जिस प्रकार जगत के ऊपर फैली धूप तथा ताप सूर्य के विस्तार होते हैं। जब कोई भगवान् की शरण में जाता है, तो वह माया के प्रभाव को पार कर जाता है क्योंकि परमेश्वर सबके हृदयों में, विशेषतया भक्त के हृदय में, स्थित रहने के कारण तथा पूर्णतया बुद्धिमान् होने के कारण मनुष्य को वह बुद्धि प्रदान करते हैं जिससे वह फिर कभी मोह के गर्त में नहीं गिरता।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥