श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 17: भगवान् को अदिति का पुत्र बनना स्वीकार  » 

 
संक्षेप विवरण
 
 जैसाकि इस अध्याय में बताया गया है अदिति द्वारा सम्पन्न पयोव्रत अनुष्ठान से अत्यधिक प्रसन्न होकर भगवान् अपने पूर्ण ऐश्वर्य सहित उनके समक्ष प्रकट हुये। उनकी प्रार्थना पर भगवान् ने उनका पुत्र बनना स्वीकार कर लिया।
जब अदिति लगातार बारह दिनों तक पयोव्रत अनुष्ठान सम्पन्न कर चुकीं तो भगवान् उन पर अत्यधिक प्रसन्न हुए और उनके समक्ष चतुर्भुजी रूप में पीताम्बर धारण किए प्रकट हुए। ज्योंही अदिति ने भगवान् को अपने समक्ष देखा वे तुरन्त उठ खड़ी हुईं और भगवान् के प्रेम में विभोर होकर उन्हें सादर नमस्कार करने के लिए भूमि पर लोट गईं। आनन्दानुभूति से उनका गला भर आया और भक्ति के कारण उनका सारा शरीर काँपने लगा। यद्यपि वे भगवान् की समुचित स्तुति करना चाह रही थीं, किन्तु वे कुछ भी नहीं कर पाईं और इस तरह कुछ समय तक मौन रहीं। तब ढाढ़स बाँधकर भगवान् के सौन्दर्य का अवलोकन करती हुई वे प्रार्थना करने लगीं। समस्त जीवों के परमात्मा भगवान् उन पर अत्यधिक प्रसन्न हुए और उन्होंने स्वांश रूप में अवतार लेकर उनका पुत्र बनना स्वीकार किया। वे कश्यपमुनि की तपस्या से पहले ही प्रसन्न हो चुके थे, अतएव उन्होंने उनका पुत्र बनना और देवताओं का पालन करना स्वीकार कर लिया। भगवान् इस प्रकार वचन देकर अन्तर्धान हो गये। भगवान् का आदेश पाकर अदिति कश्यपमुनि की सेवा में तत्पर हो गईं। कश्यपमुनि समाधि द्वारा यह देख सके कि भगवान् उनके भीतर हैं और इस तरह उन्होंने अपना वीर्य अदिति के गर्भ में स्थापित किया। हिरण्यगर्भ कहलाने वाले ब्रह्माजी जान गये कि भगवान् अदिति के गर्भ में प्रवेश कर चुके हैं। इसलिए उन्होंने भगवान् की स्तुति की।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥