श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 18: भगवान् वामनदेव : वामन अवतार  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक
तस्मा इत्युपनीताय यक्षराट् पात्रिकामदात् ।
भिक्षां भगवती साक्षादुमादादम्बिका सती ॥ १७ ॥
 
शब्दार्थ
तस्मै—उनको (वामनदेव को); इति—इस प्रकार; उपनीताय—जिनका उपवीत संस्कार हो चुका है; यक्ष-राट्—स्वर्ग के कोषाध्यक्ष तथा यक्षों के राजा कुवेर ने; पात्रिकाम्—भिक्षापात्र; अदात्—दिया; भिक्षाम्—भिक्षा के लिए; भगवती—शिव पत्नी, माता भवानी ने; साक्षात्—प्रत्यक्ष; उमा—उमा; अदात्—दिया; अम्बिका—ब्रह्माण्ड की जननी; सती—सती साध्वी ।.
 
अनुवाद
 
 जब इस प्रकार से वामन देव का यज्ञोपवीत संस्कार सम्पन्न हो चुका तो यक्षराज कुवेर ने उन्हें भिक्षा माँगने के लिए भिक्षापात्र एवं शिव पत्नी, ब्रह्माण्ड की परम साध्वी, माता भगवती ने उन्हें पहली भिक्षा दी।
 
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥