श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 18: भगवान् वामनदेव : वामन अवतार  »  श्लोक 8

 
श्लोक
प्रीताश्चाप्सरसोऽनृत्यन्गन्धर्वप्रवरा जगु: ।
तुष्टुवुर्मुनयो देवा मनव: पितरोऽग्नय: ॥ ८ ॥
 
शब्दार्थ
प्रीता:—अत्यन्त प्रसन्न होकर; च—भी; अप्सरस:—अप्सराएँ; अनृत्यन्—नाचने लगीं; गन्धर्व-प्रवरा:—श्रेष्ठ गन्धर्व गण; जगु:—गाने लगे; तुष्टुवु:—स्तुतियों द्वारा भगवान् को हर्षित किया; मुनय:—मुनियों ने; देवा:—देवताओं ने; मनव:—मनुओं ने; पितर:—पितृलोक के वासियों ने; अग्नय:—अग्नि देवताओं ने ।.
 
अनुवाद
 
 अत्यधिक हर्षित होकर अप्सराएँ प्रसन्नता के मारे नाचने लगीं, श्रेष्ठ गन्धर्व गाने लगे और महा-मुनि, देवता, मनु, पितरगण तथा अग्निदेवों ने भगवान् को प्रसन्न करने के लिए स्तुतियाँ कीं।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥