श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 19: बलि महाराज से वामनदेव द्वारा दान की याचना  »  श्लोक 2

 
श्लोक
श्रीभगवानुवाच
वचस्तवैतज्जनदेव सूनृतं
कुलोचितं धर्मयुतं यशस्करम् ।
यस्य प्रमाणं भृगव: साम्पराये
पितामह: कुलवृद्ध: प्रशान्त: ॥ २ ॥
 
शब्दार्थ
श्री-भगवान् उवाच—भगवान् ने कहा; वच:—शब्द; तव—तुम्हारे; एतत्—इस प्रकार के; जन-देव—हे जनता के राजा; सू नृतम्—अत्यन्त सच; कुल-उचितम्—तम्हारे वंश के अनुरूप; धर्म-युतम्—धार्मिक सिद्धान्तों के अनुसार; यश:-करम्— तुम्हारा यश फैलाने के लिए उपयुक्त; यस्य—जिसका; प्रमाणम्—साक्ष्य, प्रमाण; भृगव:—भृगुवंशी ब्राह्मण; साम्पराये—अगले जगत में; पितामह:—तुम्हारे बाबा; कुल-वृद्ध:—कुल में सबसे बूढ़े, वयोवृद्ध; प्रशान्त:—अत्यन्त शान्त (प्रह्लाद महाराज) ।.
 
अनुवाद
 
 भगवान् ने कहा : हे राजा! तुम सचमुच महान् हो क्योंकि तुम्हें वर्तमान सलाह देने वाले ब्राह्मण भृगुवंशी हैं, और तुम्हारे भावी जीवन के शिक्षक तुम्हारे बाबा (पितामह) प्रह्लाद महाराज हैं, जो शान्त एवं सम्माननीय (वयोवृद्ध) हैं। तुम्हारे कथन अत्यन्त सत्य हैं और वे धार्मिक शिष्टाचार से पूरी तरह मेल खाते हैं। वे तुम्हारे वंश के आचरण के अनुरूप हैं और तुम्हारे यश को बढ़ाने वाले हैं।
 
तात्पर्य
 प्रह्लाद महाराज शुद्ध भक्त के ज्वलन्त उदाहरण हैं। कोई यह तर्क कर सकता है कि वृद्ध होते हुए भी चूँकि प्रह्लाद महाराज अपने परिवार के प्रति, विशेष रूप से अपने पौत्र बलि महाराज के प्रति, आसक्त थे तो फिर वे आदर्श कैसे बन सकते हैं? इसलिए इस श्लोक में प्रशान्त: शब्द आया है। भक्त सदैव प्रशान्त होता है। वह किसी भी परिस्थिति में विचलित नहीं होता। भले ही वह गृहस्थ जीवन क्यों न बिता रहा हो और भौतिक वस्तुओं को त्याग न कर पा रहा हो तो भी उसे प्रशान्त समझना चाहिए क्योंकि वह भगवान् की शुद्ध भक्ति करता है। इसीलिए श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा है—
किबा विप्र, किबा न्यासी, शूद्र केने नय येइ कृष्णतत्त्ववेत्ता, सेइ ‘गुरु’ हय “कोई चाहे ब्राह्मण हो, या संन्यासी अथवा शूद्र—चाहे जो भी हो—यदि वह कृष्णतत्त्व को जानता है, तो वह गुरु बन सकता है” (चैतन्यचरितामृत मध्य ८.१२८)। कृष्ण का पूर्ण तत्त्ववेत्ता चाहे जीवन में किसी भी पद पर हो गुरु होता है। इस प्रकार प्रह्लाद महाराज सभी परिस्थितियों में गुरु हैं।

यहाँ पर भगवान् वामनदेव संन्यासियों तथा ब्रह्मचारियों को यह भी शिक्षा देते हैं कि मनुष्य को आवश्यकता से अधिक नहीं माँगना चाहिए। उन्होंने केवल तीन पग भूमि माँगी जबकि बलि महाराज उन्हें मुँहमाँगा दान देना चाह रहे थे।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥