श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 19: बलि महाराज से वामनदेव द्वारा दान की याचना  »  श्लोक 20

 
श्लोक
न पुमान् मामुपव्रज्य भूयो याचितुमर्हति ।
तस्माद् वृत्तिकरीं भूमिं वटो कामं प्रतीच्छ मे ॥ २० ॥
 
शब्दार्थ
न—नहीं; पुमान्—कोई व्यक्ति; माम्—मेरे पास; उपव्रज्य—पास आकर; भूय:—पुन:; याचितुम्—माँगने के लिए; अर्हति— योग्य होता है; तस्मात्—इसलिए; वृत्ति-करीम्—अपना पालन करने के लिए उपयुक्त; भूमिम्—भूमि को; वटो—हे लघु ब्रह्मचारी; कामम्—जीवन की आवश्यकता के अनुसार; प्रतीच्छ—ले लो; मे—मुझसे ।.
 
अनुवाद
 
 हे बालक! जो एक बार कुछ माँगने के लिए मेरे पास आता है उसे अन्यत्र कुछ भी माँगने की आवश्यकता नहीं रहनी चाहिए। अतएव, चाहो तो तुम मुझसे उतनी भूमि माँग सकते हो जितने से तुम्हारी जीवन-यापन संबंधी आवश्यकता पूरी हो सके।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥