श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 19: बलि महाराज से वामनदेव द्वारा दान की याचना  »  श्लोक 24

 
श्लोक
यद‍ृच्छयोपपन्नेन सन्तुष्टो वर्तते सुखम् ।
नासन्तुष्टस्त्रिभिर्लोकैरजितात्मोपसादितै: ॥ २४ ॥
 
शब्दार्थ
यदृच्छया—अपने कर्म के अनुसार परम सत्ता द्वारा जो कुछ प्रदत्त है; उपपन्नेन—जो कुछ मिला है उससे; सन्तुष्ट:—मनुष्य को सन्तुष्ट होना चाहिए; वर्तते—है; सुखम्—सुख; न—नहीं; असन्तुष्ट:—असन्तुष्ट के लिए; त्रिभि: लोकै:—तीनों लोकों को पा लने पर; अजित-आत्मा—जो अपनी इन्द्रियों को वश में नहीं कर सकता; उपसादितै:—भले ही प्राप्त क्यों न कर ले ।.
 
अनुवाद
 
 मनुष्य को अपने प्रारब्ध से जो कुछ मिलता है उससे सन्तुष्ट रहना चाहिए क्योंकि असन्तोष से कभी भी सुख प्राप्त नहीं हो सकता। जो व्यक्ति आत्मसंयमी नहीं है, वह तीनों लोकों को पाकर भी सुखी नहीं होगा।
 
तात्पर्य
 यदि सुख ही जीवन का चरम लक्ष्य है, तो प्रारब्ध से जो पद प्राप्त हुआ है उसी से मनुष्य को सन्तुष्ट रहना चाहिए। प्रह्लाद महाराज ने भी यही आदेश दिया है—
सुखम् ऐन्द्रियकं दैत्या देहयोगेन देहिनाम्।

सर्वत्र लभ्यते दैवाद् यथा दु:खम् अयत्नत: ॥

“हे दैत्य मित्रो! देहस्पर्श के द्वारा इन्द्रियविषयों से अनुभव किया जाने वाला सुख जीवन के किसी भी रूप में अपने पूर्वकर्मों के अनुसार प्राप्त किया जा सकता है। ऐसा सुख बिना किसी प्रयास के स्वत: प्राप्त हो जाता है, जिस प्रकार कि हमें दुख प्राप्त होता है।” (भागवत७.६.३)। सुख-प्राप्ति के सम्बन्ध में यह विचारधारा बिल्कुल सही है।

भगवद्गीता (६.२१) में असली सुख का वर्णन इस प्रकार हुआ है—

सुखम् आत्यन्तिकं यत्तद् बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम्।

वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वत: ॥

“आध्यात्मिक रूप से हर्षमय स्थिति में मनुष्य असीम दिव्य सुख में रहता है और दिव्य इन्द्रियों के द्वारा उसका भोग करता है। इस प्रकार स्थापित हो जाने पर फिर वह सत्य से कभी दूर नहीं जाता।” मनुष्य को सुख की अनुभूति परा इन्द्रियों से करनी होती है। परा इन्द्रियाँ भौतिक तत्त्वों से बनी इन्द्रियाँ नहीं होतीं। हममें से प्रत्येक व्यक्ति आध्यात्मिक प्राणी है (अहं ब्रह्मास्मि) और प्रत्येक व्यक्ति व्यष्टि देही है। इस समय हमारी इन्द्रियाँ भौतिक तत्त्वों से आच्छादित हैं और अज्ञान के कारण आच्छादित करने वाली इन इन्द्रियों को हम अपनी वास्तविक इन्द्रियाँ मान लेते हैं। किन्तु अपनी वास्तविक इन्द्रियाँ तो भौतिक आवरण के भीतर हैं। देहिनोऽस्मिन यथा देहे—भौतिक तत्त्वों के आवरण के भीतर आध्यात्मिक इन्द्रियाँ होती हैं। सर्वोपाधि विनिर्मुक्तं तत्परत्वेन निर्मलम्—आध्यात्मिक इन्द्रियों के अनाच्छादित होते ही हम इन इन्द्रियों के द्वारा सुखी हो सकते हैं। आध्यात्मिक इन्द्रियों की तुष्टि का वर्णन इस प्रकार हुआ है—हृषीकेन हृषीकेशसेवनं भक्तिरुच्यते। जब इन्द्रियाँ हृषीकेश की भक्ति में लगी रहती हैं तब इन इन्द्रियों की पूर्ण तुष्टि होती है। इन्द्रियतृप्ति के इस श्रेष्ठ ज्ञान के बिना कोई अपनी भौतिक इन्द्रियों को तुष्ट करने का प्रयास कर सकता है, किन्तु उसे सुख कभी नहीं मिल सकेगा। इन्द्रियतुष्टि की अपनी अभिलाषा को चाहे कोई बढ़ा ले और अपनी इन्द्रियतुष्टि के लिए इच्छित फल भी प्राप्त कर ले, किन्तु उसे कभी सुख एवं सन्तोष प्राप्त नहीं हो सकेगा क्योंकि यह भौतिक स्तर पर होता है।

ब्राह्मण संस्कृति के अनुसार मनुष्य को बिना किसी विशेष प्रयास के जो प्राप्त हो जाये उसी से सन्तुष्ट रहना चाहिए और आध्यात्मिक चेतना का अनुशीलन करना चाहिए। तभी वह सुखी होगा। कृष्णभावनामृत आन्दोलन का प्रयोजन इसी ज्ञान का प्रसार करना है। जिन व्यक्तियों को वैज्ञानिक आध्यात्मिक ज्ञान नहीं होता वे भ्रमवश सोचते हैं कि कृष्णभावनामृत आन्दोलन के सदस्य भौतिक कार्यकलापों से दूर रहने का प्रयास करने वाले पलायनवादी हैं। जबकि तथ्य यह है कि हम जीवन के चरम सुख को प्राप्त करने के वास्तविक कार्यों में लगे रहते हैं। यदि किसी को आध्यात्मिक इन्द्रियों को तुष्ट करने का प्रशिक्षण न मिले और वह भौतिक इन्द्रियतृप्ति में लगा रहे तो उसे कभी भी नित्य तथा आनन्दमय सुख नहीं मिल सकेगा। अतएव श्रीमद्भागवत (५.५.१) में संस्तुति की गई है—

तपो दिव्यं पुत्रका येन सत्त्वं शुद्ध्येद् यस्माद् ब्रह्मसौख्यं त्वनन्तम् मनुष्य को तपस्या करनी चाहिए जिससे उसकी अस्तित्व परक स्थिति पवित्र हो जाये और उसे असीम आनन्दमय जीवन की प्राप्ति हो सके।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥