श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 19: बलि महाराज से वामनदेव द्वारा दान की याचना  »  श्लोक 35

 
श्लोक
निष्ठां ते नरके मन्ये ह्यप्रदातु: प्रतिश्रुतम् ।
प्रतिश्रुतस्य योऽनीश: प्रतिपादयितुं भवान् ॥ ३५ ॥
 
शब्दार्थ
निष्ठाम्—शाश्वत निवास स्थान; ते—तुम्हारा; नरके—नरक में; मन्ये—सोचता हूँ; हि—निस्सन्देह; अप्रदातु:—वचन पूरा न कर सकने वाले पुरुष का; प्रतिश्रुतम्—जिसको वचन दिया गया हो; प्रतिश्रुतस्य—किसी के द्वारा दिये गये वचन का; य: अनीश:—अशक्त; प्रतिपादयितुम्—पूरी तरह पूर्ण करने में; भवान्—आप ।.
 
अनुवाद
 
 तुम निश्चित रूप से अपना वचन पूरा करने में असमर्थ होगे और मैं सोचता हूँ कि अपनी इस असमर्थता के कारण तुम्हें नरक में शाश्वत निवास करना पड़ेगा।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥