श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 19: बलि महाराज से वामनदेव द्वारा दान की याचना  »  श्लोक 39

 
श्लोक
सत्यं पुष्पफलं विद्यादात्मवृक्षस्य गीयते ।
वृक्षेऽजीवति तन्न स्यादनृतं मूलमात्मन: ॥ ३९ ॥
 
शब्दार्थ
सत्यम्—वास्तविक सत्य; पुष्प-फलम्—फूल तथा फल; विद्यात्—समझा जाना चाहिए; आत्म-वृक्षस्य—शरीर रूपी वृक्ष के; गीयते—जैसा वेदों में वर्णित है; वृक्षे अजीवति—यदि वृक्ष ही न जीवित रहे; तत्—वह (पुष्पफलम् ); न—नहीं; स्यात्—हो; अनृतम्—झूठ; मूलम्—जड़; आत्मन:—शरीर की ।.
 
अनुवाद
 
 वेदों का आदेश है कि शरीर रूपी वृक्ष का वास्तविक परिणाम तो इस से मिलने वाले उत्तम फल तथा फूल हैं। किन्तु यदि यह शरीर रूपी वृक्ष ही न रहे तो फिर इन वास्तविक फल-फूलों के होने की कोई सम्भावना नहीं है। यहाँ तक कि यदि शरीर असत्य की नींव पर भी टिका हो तो भी शरीर रूपी वृक्ष के बिना वास्तविक फल-फूल नहीं हो सकते।
 
तात्पर्य
 यह श्लोक बताता है कि इस शरीर में रंचमात्र असत्य के बिना असली सत्य भी नहीं विद्यमान रह सकता। मायावादियों का कहना है—ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या—आत्मा सत्य है और माया असत्य है। किन्तु वैष्णव दार्शनिकों को मायावादी दर्शन मान्य नहीं है। यदि तर्क के लिए इस भौतिक जगत को मिथ्या मान भी लिया जाये तो माया में फँसा जीव शरीर की सहायता के बिना इससे बाहर निकल भी नहीं सकता। शरीर की सहायता के बिना कोई न तो धर्म का पालन कर सकता है, न कोई दार्शनिक पूर्णता का चिन्तन कर सकता है। अतएव फूल तथा फल (पुष्पफलम् ) को शरीर के परिणाम के रूप में प्राप्त करना होता है। शरीर की सहायता
के बिना वह फल प्राप्त भी नहीं हो सकता। इसलिए वैष्णव दर्शन युक्त-वैराग्य की संस्तुति करता है। ऐसा नहीं है कि सारा ध्यान शरीर पर ही दिया जाये, किन्तु उसके साथ-साथ शरीर के भरण-पोषण की उपेक्षा भी न की जाये। जब तक शरीर रहता है मनुष्य वैदिक आदेशों का पूरा अध्ययन करके जीवन के अन्त समय सिद्धि प्राप्त कर सकता है। इसकी व्याख्या भगवद्गीता (८.६) में हुई है—यं यं वापि स्मरन् भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्। मृत्यु के समय हर बात की परीक्षा होती है। इसलिए यद्यपि यह शरीर नश्वर है, नित्य नहीं है, मनुष्य इससे अच्छी से अच्छी सेवा ले सकता है और अपने जीवन को पूर्ण बना सकता है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥