श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 19: बलि महाराज से वामनदेव द्वारा दान की याचना  »  श्लोक 40

 
श्लोक
तद् यथा वृक्ष उन्मूल: शुष्यत्युद्वर्ततेऽचिरात् ।
एवं नष्टानृत: सद्य आत्मा शुष्येन्न संशय: ॥ ४० ॥
 
शब्दार्थ
तत्—अतएव; यथा—जिस प्रकार; वृक्ष:—वृक्ष; उन्मूल:—जड़ समेत उखाडऩे पर; शुष्यति—सूख जाता है; उद्वर्तते—गिर पड़ता है; अचिरात्—शीघ्र ही; एवम्—उसी तरह; नष्ट—नष्ट हुआ; अनृत:—यह नाशवान् शरीर; सद्य:—तुरन्त; आत्मा—शरीर; शुष्येत्—सूख जाता है; न—नहीं; संशय:—कोई सन्देह ।.
 
अनुवाद
 
 जड़ समेत उखाडऩे पर वृक्ष तुरन्त गिर जाता है और सूखने लगता है। इसी प्रकार यदि कोई इस शरीर की परवाह नहीं करता, जो असत्य माना जाता है—अर्थात् यदि इस असत्य का उन्मूलन कर दिया जाये—तो यह शरीर निश्चय ही सूख जाता है।
 
तात्पर्य
 इस प्रसंग में श्रील रूप गोस्वामी कहते हैं—
प्रापञ्चिकतया बुद्ध्या हरिसम्बन्धिवस्तुन:।

मुमुक्षुभि: परित्यागो वैराग्यं फल्गु कथ्यते ॥

“जो व्यक्ति वस्तुओं का कृष्ण से सम्बन्ध जाने बिना उन्हें बहिष्कृत कर देता है उसका वैराग्य अधूरा होता है।” (भक्तिरसामृत-सिन्धु १.२.२६६)।

यदि शरीर कृष्ण की सेवा में निरत हो तो शरीर को भौतिक नहीं मानना चाहिए। कभी-कभी गुरु के आध्यात्मिक शरीर के विषय में भ्रम हो जाता है। किन्तु श्रील रूप गोस्वामी उपदेश देते हैं— प्रापञ्चिकतया बुद्ध्या हरिसम्बन्धि-वस्तुन:। कृष्ण की सेवा में पूर्णतय निरत शरीर की उपेक्षा भौतिक समझकर नहीं करनी चाहिए। जो उपेक्षा करता है उसका वैराग्य झूठा है। यदि शरीर का ठीक से भरण-पोषण नहीं होता तो यह जड़ से उखाड़े गये वृक्ष की भाँति गिर कर सूख जाता है, जिससे आगे फल-फूल नहीं लिए जा सकते। अत: वेदों का आदेश है—

ॐ इति सत्यं नेत्यनृतं तद् एतत्पुष्पं फलं वाचो यत् सत्यं सहेश्वरो यशस्वी कल्याणकीर्तिर्भविता। पुष्पं हि फलं वाच: सत्यं वदत्यथैतन्मूलं वाचो यदनृतं यद्यथा वृक्ष अविर्मूल: शुष्यति, स उद्वर्तत एवमेवानृतं वदन्नाविर्मूलम् आत्मानं करोति, स शुष्यति स उद्वर्तते, तस्मादनृतं न वदेद् दयेत त्वेतेन।

तात्पर्य यह है कि जो कार्य परम सत्य (ॐ तत्सत् ) की तुष्टि के लिए शरीर की सहायता से किये जाते हैं, वे कभी नाशवान् नहीं होते, भले ही वे नाशवान् शरीर द्वारा सम्पन्न किए जाँए। निस्सन्देह, ऐसे कार्य शाश्वत होते हैं। अतएव शरीर की ठीक से देखभाल करनी चाहिए। चूँकि यह शरीर शाश्वत नहीं है, नाशवान् है कोई इसे शेर द्वारा खाया जाने नहीं दे सकता है, न किसी शत्रु के द्वारा वध होने दिया जा सकता है। शरीर की रक्षा के लिए सारी सावधानियाँ बरतनी चाहिए।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥