श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 19: बलि महाराज से वामनदेव द्वारा दान की याचना  »  श्लोक 41

 
श्लोक
पराग् रिक्तमपूर्णं वा अक्षरं यत् तदोमिति ।
यत् किञ्चिदोमिति ब्रूयात् तेन रिच्येत वै पुमान् ।
भिक्षवे सर्वम्ॐ कुर्वन्नालं कामेन चात्मने ॥ ४१ ॥
 
शब्दार्थ
पराक्—जो पृथक् करे; रिक्तम्—जो आसक्ति से मुक्त बनाये; अपूर्णम्—अपूर्ण, अधूरा; वा—अथवा; अक्षरम्—यह अक्षर; यत्—जो; तत्—वह; ओम्—ओङ्कार; इति—इस प्रकार कहा गया; यत्—जो; किञ्चित्—जो कुछ भी; ॐ—ओङ्कार; इति— इस प्रकार; ब्रूयात्—यदि तुम कहो; तेन—ऐसा कहने से; रिच्येत—मुक्त हो जाता है; वै—निस्सन्देह; पुमान्—मनुष्य; भिक्षवे—भिक्षुक को; सर्वम्—सारा; ॐ कुर्वन्—ॐ शब्द का उच्चारण करते हुए दान देने से; न—नहीं; अलम्—पर्याप्त; कामेन—इन्द्रियतृप्ति के लिए; च—भी; आत्मने—आत्म-साक्षात्कार के लिए ।.
 
अनुवाद
 
 ॐ शब्द का उच्चारण ही मनुष्य के धनधान्य के वियोग का सूचक है। दूसरे शब्दों में, ॐ का उच्चारण करने से मनुष्य धन के प्रति आसक्ति से छूट जाता है क्योंकि उसका धन उससे ले लिया जाता है। किन्तु धनविहीन होना ठीक नहीं है क्योंकि ऐसी अवस्था में मनुष्य अपनी इच्छाओं को पूरा नहीं कर सकता। दूसरे शब्दों में, ॐ शब्द का उच्चारण करने से मनुष्य विपन्न हो जाता है। विशेषतया जब कोई किसी दरिद्र व्यक्ति या भिक्षुक को दान देता है, तो उसका आत्म-साक्षात्कार तथा उसकी इन्द्रियतृप्ति अधूरे रह जाते हैं।
 
तात्पर्य
 बलि महाराज भिक्षुक रूप में आये वामनदेव को सर्वस्व दान कर देना चाहते थे, किन्तु बलि महाराज के कुलगुरु शुक्राचार्य उनके इस वचन को नहीं समझ पाये। शुक्राचार्य ने वैदिक साक्ष्य प्रस्तुत किया कि दरिद्र व्यक्ति को सर्वस्व दान नहीं देना चाहिए वरन् जब कोई दरिद्र दान माँगने आये तो उससे इस प्रकार झूठ बोले “मेरे पास जितना था आपको दे दिया। अब मेरे पास और कुछ भी नहीं है।” मनुष्य को चाहिए अपना सर्वस्व दान में न दे। वास्तव में ॐ शब्द ओम् तत् सत् अर्थात् परम सत्य के लिए है। ओङ्कार धन के प्रति आसक्ति से छुटकारे के लिए है क्योंकि धन का उपयोग परमेश्वर के हेतु करना चाहिए। आधुनिक सभ्यता में गरीबों को दान देने की प्रवृत्ति है। ऐसे दान का कोई आध्यात्मिक महत्त्व नहीं होता क्योंकि वास्तव में हम देखते हैं कि यद्यपि निर्धनों के लिए अनेक अस्पताल तथा अन्य संस्थान हैं, किन्तु प्रकृति के तीन गुणों के अनुसार निर्धन वर्ग तो सदैव रहेगा ही। अनेक धर्मार्थ संस्थाओं के होते हुए भी गरीबी को मानव समाज से दूर नहीं भगाया जा सका है। अतएव यहाँ पर संस्तुति की गई है—भिक्षवे सर्वम् ओम् कुर्वन् नालं कामेन चात्मने। मनुष्य को चाहिए कि निर्धन भिक्षुओं को अपना सारा धन न बाँटे।
इसका सर्वोत्तम हल है कृष्णभावनामृत आन्दोलन। यह आन्दोलन निर्धनों के प्रति सदैव दयालु रहता है—केवल इसलिए नहीं कि यह उन्हें भोजन देता है अपितु उन्हें कृष्णभावनाभावित होने की विधि सिखा कर जागृत भी करता है। अतएव हम उन निर्धनों के लिए हजारों केन्द्र खोल रहे हैं, जो धन तथा ज्ञान दोनों में निर्धन हैं। इन निर्धनों को कृष्णभावनामृत का ज्ञान देने तथा उन्हें अवैध मैथुन, नशा, मांसाहार तथा जुआ खेलने से दूर रह कर अपना चरित्र सुधारने के लिए इन केन्द्रों को स्थापित किया जा रहा है। इन जघन्य पापकर्मों के कारण मनुष्यों को जन्म-जन्मांतर कष्ट भोगने पड़ते हैं। धन के सदुपयोग की सर्वश्रेष्ठ विधि है ऐसा केन्द्र खोलना जहाँ सभी लोग रहकर अपना चरित्र सुधार सकें और वे समस्त शारीरिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए सभी सुविधाएँ प्राप्त कर सकें, किन्तु वहाँ वे आध्यात्मिक नियंत्रण में रहें जिससे वे सुखपूर्वक जीवन बिताते हुए कृष्णभावनामृत में प्रगति करने के लिए अपना समय बचा सकें। यदि किसी के पास धन है, तो उसे व्यर्थ ही नहीं बहाना चाहिए। इसका उपयोग कृष्णभावनामृत आन्दोलन को अग्रसर करने में होना चाहिए जिससे सारा मानव समाज सुखी, समृद्ध तथा भगवद्धाम वापस जाने के प्रति आशान्वित हो सके। इस सम्बन्ध में वैदिक मंत्र इस प्रकार है—

पराग्वा एतद् रिक्तमक्षरं यदेतद् ॐ इति तद्यत्किञ्चिद् ॐ इति आहात्रैवास्मै तद् रिच्यते। स यत्सर्वम् ॐ कुर्याद् रिच्यादात्मानं स कामेभ्यो नालं स्यात्।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥