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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 2: गजेन्द्र का संकट  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  8.2.30 
ततो गजेन्द्रस्य मनोबलौजसां
कालेन दीर्घेण महानभूद् व्यय: ।
विकृष्यमाणस्य जलेऽवसीदतो
विपर्ययोऽभूत् सकलं जलौकस: ॥ ३० ॥
 
शब्दार्थ
तत:—तत्पश्चात्; गज-इन्द्रस्य—हाथियों के राजा का; मन:—उत्साहबल का; बल—शारीरिक शक्ति; ओजसाम्—तथा इन्द्रियों का बल; कालेन—वर्षों से लड़ते रहने से; दीर्घेण—दीर्घकालीन; महान्—महान्; अभूत्—गई; व्यय:—चुक; विकृष्यमाणस्य—(घडिय़ाल द्वारा) खींचा जाने वाला; जले—जल में; अवसीदत:—घट गई (मानसिक, शारीरिक तथा ऐन्द्रिय शक्ति); विपर्यय:—विपरीत; अभूत्—हो गया; सकलम्—सभी; जल-ओकस:—घडिय़ाल, जिसका घर जल है ।.
 
अनुवाद
 
 तत्पश्चात् जल के भीतर खींचे जाने तथा दीर्घकाल तक लड़ते रहने के कारण हाथी की मानसिक, शारीरिक तथा ऐन्द्रिय शक्ति घटने लगी। इसके विपरीत जल का पशु होने के कारण घडिय़ाल का उत्साह, उसकी शारीरिक शक्ति तथा ऐन्द्रिय शक्ति बढ़ती रही।
 
तात्पर्य
 हाथी तथा घडिय़ाल की लड़ाई में अन्तर यह था कि हाथी अत्यन्त शक्तिशाली होते हुए भी पराये स्थान अर्थात् जल में था। एक हजार वर्षों की लड़ाई के दौरान उसे कोई भोजन नहीं मिल पाया जिससे उसकी शारीरिक शक्ति क्षीण होने लगी। उसकी शारीरिक शक्ति क्षीण होने से मन भी कमजोर पडऩे लगा और उसकी इन्द्रियाँ शिथिल पड़ गईं। किन्तु घडिय़ाल तो जल का प्राणी ठहरा। उसे किसी तरह की कठिनाई नहीं हुई। उसे भोजन प्राप्त होता रहा जिससे उसे मानसिक शक्ति तथा ऐन्द्रिय प्रोत्साहन मिल रहा था। इस प्रकार जहाँ हाथी का बल घटता गया वहाँ घडिय़ाल अधिकाधिक बलशाली बनता गया। अब हम इससे यह शिक्षा ग्रहण कर सकते हैं कि माया से लड़ाई लडऩे में हम ऐसी स्थिति में न पड़ें जिस से कि हमारा बल, उत्साह तथा इन्द्रियाँ शक्तिपूर्वक लडऩे में असमर्थ हो जाँए। हमारे कृष्णभावनामृत आन्दोलन ने सचमुच माया के विरुद्ध युद्ध ठान लिया है, जिसमें सारे जीव सभ्यता की झूठी मानसिकता लेकर सड़ रहे हैं। इस कृष्णभावनामृत आन्दोलन के सिपाहियों में सदा शारीरिक शक्ति, उत्साह तथा ऐन्द्रिय शक्ति रहनी चाहिए। स्वस्थ रहने के लिए उन्हें अपने को सामान्य दशा में रखना चाहिए। सामान्य दशा हर एक के लिए एक सी नहीं होती; अतएव वर्णाश्रम विभाग बनाए गए हैं—ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ तथा संन्यास। विशेषतया इस कलियुग में संन्यास लेने की सलाह नहीं दी जाती है—

अश्वमेधं गवालम्भं संन्यासं पलपैतृकम्।

देवरेण सुतोत्पत्तिं कलौ पञ्च विवर्जयेत ॥

(ब्रह्मवैवर्त पुराण) इससे हम समझ सकते हैं कि इस युग में संन्यास आश्रम इसलिए वर्जित हैं क्योंकि लोग बलवान् नहीं हैं। श्री चैतन्य महाप्रभु ने चौबीस वर्ष की आयु में संन्यास लेकर आदर्श प्रस्तुत किया है, लेकिन सार्वभौम भट्टाचार्य तक ने श्री चैतन्य महाप्रभु को सतर्क रहने की सलाह दी थी क्योंकि उन्होंने कम उम्र में संन्यास ले लिया था। हम प्रचार करने के लिए तरुण बालकों को संन्यास प्रदान करते हैं, किन्तु ऐसा अनुभव किया जा रहा है कि वे संन्यास ग्रहण करने के योग्य नहीं हैं। इसमें कोई हानि नहीं है यदि कोई यह सोचे कि वह संन्यास के योग्य नहीं है; किन्तु यदि वे काम-भोग से सदैव विचलित होते हों तो उन्हें ऐसे आश्रम में जाना चाहिए जिसमें काम-भोग की छूट हो अर्थात् वे गृहस्थ आश्रम में जाँए। यदि कोई एक स्थान में अशक्त जान पड़े तो इसका अर्थ यह नहीं होता कि वह घडिय़ाल रूपी माया से लडऩा बन्द कर दे। हमें कृष्ण के चरणकमलों की शरण ग्रहण करनी चाहिए जैसाकि गजेन्द्र ने किया था। उसी के साथ वह गृहस्थ भी बना रह सकता है यदि वह काम-भोग में लिप्त रहने से संतुष्ट है। लड़ाई बन्द करने की आवश्यकता नहीं है। अतएव श्री चैतन्य महाप्रभुने संस्तुति की है—स्थाने स्थिता: श्रुतिगतां तनुवाङ्मनोभि:। कोई अपने अनुकूल किसी भी आश्रम में रह सकता है; संन्यास ग्रहण करना अनिवार्य नहीं है। यदि उसका मन काम-भोग से चलायमान रहता है, तो वह गृहस्थ आश्रम में प्रवेश कर सकता है। लेकिन उसे लड़ाई जारी रखनी चाहिए। जो दिव्य पद को प्राप्त नहीं है उसके लिए कृत्रिम रूप से संन्यास ग्रहण करना कोई श्रेय की बात नहीं है। यदि संन्यास उपयुक्त नहीं है, तो वह गृहस्थ आश्रम में प्रविष्ट होकर माया के विरुद्ध बलपूर्वक लड़ सकता है। लेकिन उसे लड़ाई बन्द करके भागना नहीं चाहिए।

 
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