श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 2: गजेन्द्र का संकट  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक
स चावनिज्यमानाङ्‍‍घ्रि: समन्तात् पयऊर्मिभि: ।
करोति श्यामलां भूमिं हरिन्मरकताश्मभि: ॥ ४ ॥
 
शब्दार्थ
स:—वह पर्वत; च—भी; अवनिज्यमान-अङ्घ्रि:—जिसका चरण सदा प्रक्षालित होता है; समन्तात्—चारों ओर से; पय: ऊर्मिभि:—दूध की लहरों से; करोति—बनाता है; श्यामलाम्—गहरा हरा; भूमिम्—भूमि को; हरित्—हरी; मरकत—मरकत मणि; अश्मभि:—पत्थरों से ।.
 
अनुवाद
 
 पर्वत के पाद की भूमि सदैव दूध की लहरों से प्रक्षालित होती रहती है, जो आठों दिशाओं में (उत्तर, दक्षिण, पूर्व, पश्चिम तथा इनके बीच की दिशाओं में) मरकत मणियाँ उत्पन्न करती रहती है।
 
तात्पर्य
 हमें श्रीमद्भागवत से पता चलता है कि समुद्र कई प्रकार के हैं। कहीं दूध का सागर है, कहीं सुरा का सागर, तो कहीं घृत, तेल या मीठे जल का सागर है। इस तरह इस ब्रह्माण्ड में नाना प्रकार के समुद्र हैं। आधुनिक विज्ञानी अपने सीमित ज्ञान के बल पर इन कथनों को चुनौती नहीं दे सकते; वे हमें किसी भी लोक के विषय में पूरी जानकारी नहीं दे सकते यहाँ तक कि जिस लोक में हम रह रहे हैं उसके विषय में भी। इस श्लोक से हम समझ सकते हैं कि यदि किन्हीं पर्वतों की घाटियाँ दुग्ध से प्रक्षालित हों तो उनमें मरकत मणियाँ उत्पन्न होती हैं। किसी में इतनी सामर्थ्य नहीं कि भगवान् द्वारा संचालित भौतिक प्रकृति के कार्यकलापों का अनुकरण कर सके।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥