श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 2: गजेन्द्र का संकट  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक
यत्र सङ्गीतसन्नादैर्नदद्गुहममर्षया ।
अभिगर्जन्ति हरय: श्लाघिन: परशङ्कया ॥ ६ ॥
 
शब्दार्थ
यत्र—उस (त्रिकूट) पर्वत में; सङ्गीत—गायन की; सन्नादै:—ध्वनि से; नदत्—प्रतिध्वनित; गुहम्—गुफाएँ; अमर्षया—असह्य क्रोध या ईर्ष्या के कारण; अभिगर्जन्ति—दहाड़ते हैं; हरय:—सिंह; श्लाघिन:—अपने बलपर अत्यन्त गर्वित; पर-शङ्कया—दूसरे सिंह की आशंका से ।.
 
अनुवाद
 
 गुफाओं में स्वर्ग के निवासियों के गायन की गूँजती हुई ध्वनियों के कारण वहाँ के सिंह, जिन्हें अपनी शक्ति पर गर्व है, असह्य ईर्ष्या के कारण यह सोचकर गर्जना करते हैं कि वहाँ पर कोई अन्य सिंह वैसे ही दहाड़ रहा है।
 
तात्पर्य
 उच्चतर लोकों में, न केवल विभिन्न प्रकार के मनुष्य ही हैं, अपितु सिंह तथा हाथी जैसे पशु भी हैं। वहाँ वृक्ष हैं और वहाँ की धरती मरकतों से बनी है। ऐसी है भगवान् की सृष्टि! इस प्रसंग में श्रील भक्ति विनोद ठाकुर का गीत है—केशव! तुया जगत् विचित्र—हे केशव! आपकी सृष्टि रंग- बिरंगी तथा नाना किस्मों से पूर्ण है। भूविज्ञानी, वनस्पतिविज्ञानी तथा अन्य तथाकथित विज्ञानी अन्य लोकों के विषय में मनोकल्पना करते हैं, किन्तु उनकी विविधताओं का अनुमान न लगा पाने के कारण वे झूठे ही यह कल्पना करते हैं कि इस लोक को छोडक़र अन्य सारे लोक शून्य, निर्जन तथा धूल से भरे हैं। इस तरह वे ब्रह्माण्ड में विद्यमान विभिन्न किस्मों का अनुमान तक न लगा सकने पर भी अपने ज्ञान से गर्वित रहते हैं और अपनी ही क्षमता वाले लोगों द्वारा विद्वान माने जाते हैं। जैसाकि श्रीमद्भागवत (२.३.१९) में कहा गया है—श्वविड्वराहोष्ट्रखरै: संस्तुत: पुरुष: पशु:—भौतिकतावादी नेताओं की प्रशंसा कुत्ते, सुअर, ऊँट तथा गधे करते हैं, जो स्वयं भी बड़े पशु हैं। मनुष्य को बड़े पशु द्वारा प्रदत्त ज्ञान से संतुष्ट नहीं होना चाहिए। प्रत्युत उसे शुकदेव गोस्वामी जैसे सिद्ध पुरुष से ज्ञान प्राप्त करना चाहिए। महाजनो येन गत: स पन्था:—हमारा कर्तव्य है कि महाजनों के उपदेशों का पालन करें। महाजनों की संख्या बारह है और शुकदेव गोस्वामी उनमें से एक हैं (भागवत ६.३.२०)।

स्वयम्भूर्नारद: शम्भु: कुमार: कपिलो मनु:।

प्रह्लादो जनको भीष्मो बलिर्वैयासकिर्वयम् ॥

वैयासकि ही शुकदेव गोस्वामी हैं। वे जो कुछ भी कहते हैं वह तथ्यात्मक है। यही पूर्ण ज्ञान है।

 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥