श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 20: बलि महाराज द्वारा ब्रह्माण्ड समर्पण  »  श्लोक 14

 
श्लोक
श्रीशुक उवाच
एवमश्रद्धितं शिष्यमनादेशकरं गुरु: ।
शशाप दैवप्रहित: सत्यसन्धं मनस्विनम् ॥ १४ ॥
 
शब्दार्थ
श्री-शुक: उवाच—श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; एवम्—इस प्रकार; अश्रद्धितम्—गुरु के आदेश का आदर न करने वाले; शिष्यम्—शिष्य को; अनादेश-करम्—जो अपने गुरु के आदेश का पालन करने को तैयार न था; गुरु:—गुरु (शुक्राचार्य) ने; शशाप—शाप दिया; दैव-प्रहित:—भगवान् से प्रेरित होकर; सत्य-सन्धम्—जो सत्य पर अडिग थे; मनस्विनम्—जिसका चरित्र अत्युच्च था, सच्चरित्र ।.
 
अनुवाद
 
 श्री शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा : तत्पश्चात् भगवान् से प्रेरित होकर गुरु शुक्राचार्य ने अपने उच्च शिष्य बलि महाराज को शाप दे दिया जो इतने उदार एवं सत्यनिष्ठ थे कि अपने गुरु के आदेशों को मानने की बजाये उनकी आज्ञा का उल्लघंन करना चाह रहे थे।
 
तात्पर्य
 बलि महाराज तथा उनके गुरु शुक्राचार्य के आचरण में यही अन्तर था कि बलि महाराज में तो पहले से ही ईश-प्रेम विकसित हो चुका था, किन्तु नैत्यिक कर्मकाण्ड के पुरोहित मात्र होने के कारण शुक्राचार्य में ऐसा नहीं हो पाया था। इस प्रकार शुक्राचार्य को भगवान् से कभी प्रेरणा नहीं मिली कि भक्ति विकसित करे। भगवद्गीता (१०.१०) में स्वयं भगवान् ने कहा है—
तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम्।

ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते ॥

“जो लोग निरन्तर भक्ति करते हैं और प्रेमपूर्वक मेरी पूजा करते हैं उन्हें मैं ज्ञान देता हूँ जिससे वे मेरे पास आ सकते हैं।”

जो भक्तगण सचमुच श्रद्धा तथा प्रेमपूर्वक भक्ति में लगे रहते हैं उन्हें भगवान् प्रेरित करते हैं। वैष्णवजन कभी भी कर्मकाण्डी स्मार्त ब्राह्मणों की परवाह नहीं करते। इसीलिए श्रील सनातन गोस्वामी ने वैष्णवों के मार्गदर्शन के लिए जो स्मार्त विधि का कभी पालन नहीं करते। हरि-भक्तिविलास का संग्रह किया है। यद्यपि भगवान् जन-जन के हृदय में वास करते हैं, किन्तु जब तक कोई वैष्णव नहीं होता और जब तक वह भक्ति में निरत नहीं होता तब तक उसे सही उपदेश प्राप्त नहीं हो पाता जिससे वह भगवद्धाम वापस जा सके। ऐसे उपदेश केवल भक्तों के निमित्त होते हैं। अतएव इस श्लोक में दैव-प्रहित: शब्द महत्त्वपूर्ण है, जिसका अर्थ है “भगवान् द्वारा प्रेरित होकर।” शुक्राचार्य को चाहिए था कि वे बलि महाराज को प्रोत्साहित करते कि वे भगवान् विष्णु को सर्वस्व दे दें; यह भगवत्-प्रेम का लक्षण होता किन्तु उन्होंने ऐसा नहीं किया। उल्टे, उन्होंने अपने भक्त—शिष्य को शाप देकर दण्डित करना चाहा।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥