श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 20: बलि महाराज द्वारा ब्रह्माण्ड समर्पण  »  श्लोक 2

 
श्लोक
श्रीबलिरुवाच
सत्यं भगवता प्रोक्तं धर्मोऽयं गृहमेधिनाम् ।
अर्थं कामं यशो वृत्तिं यो न बाधेत कर्हिचित् ॥ २ ॥
 
शब्दार्थ
श्री-बलि: उवाच—बलि महाराज ने कहा; सत्यम्—सत्य है; भगवता—आपके द्वारा; प्रोक्तम्—कहा गया; धर्म:—धर्म; अयम्—यह; गृहमेधिनाम्—विशेष रूप से गृहस्थों के लिए; अर्थम्—आर्थिक विकास; कामम्—इन्द्रियतृप्ति; यश: वृत्तिम्— यश एवं जीविका का साधन; य:—जो धर्म; न—नहीं; बाधेत—बाधा पहुँचाता है; कर्हिचित्—किसी समय ।.
 
अनुवाद
 
 बलि महाराज ने कहा : जैसा कि आप कह चुके हैं, जो धर्म किसी के आर्थिक विकास, इन्द्रियतृप्ति, यश तथा जीविका के साधन में बाधक नहीं होता वही गृहस्थ का असली धर्म है। मैं भी सोचता हूँ कि यही धर्म सही है।
 
तात्पर्य
 बलि महाराज द्वारा शुक्राचार्य को दिया गया गम्भीर उत्तर भावपूर्ण है। शुक्राचार्य ने इस बात पर बल दिया था कि मनुष्य की जीविका का भौतिक साधन, उसका भौतिक यश, इन्द्रियतृप्ति तथा आर्थिक विकास उचित तरीके से बने रहने चाहिएँ। भौतिक मामलों में रुचि रखने वाले गृहस्थ का पहला कर्तव्य है कि वह इसका ध्यान रखे। यदि कोई धार्मिक सिद्धान्त किसी की भौतिक दशा को प्रभावित नहीं करता तो उसे स्वीकार करना चाहिए। इस समय इस कलियुग में यह विचार अत्यन्त प्रधान है। कोई भी व्यक्ति ऐसा धर्म स्वीकार करने को तैयार नहीं है, जो भौतिक सम्पन्नता में बाधक हो। शुक्राचार्य भौतिकतावादी संसारी पुरुष होने के कारण भक्त के सिद्धान्तों को नहीं जानते थे। भक्त भगवान् की पूर्ण तुष्टि के लिए सेवा करने के लिए कृतसंकल्प रहता है। ऐसी कोई भी
वस्तु जो इस संकल्प में बाधक बने त्याग कर देनी चाहिए। यही भक्ति का सिद्धान्त है। आनुकूल्यस्य संकल्प: प्रातिकूल्यस्य वर्जनम् (चैतन्यचरितामृत, मध्य २२.१००)। भक्ति करने के लिए मनुष्य को केवल वही स्वीकार करना चाहिए जो अनुकूल हो और उसका परित्याग कर देना चाहिए जो प्रतिकूल हो। बलि महाराज को वामनदेव के चरणकमलों पर अपना सर्वस्व अर्पित करने का सुयोग प्राप्त हुआ था, किन्तु शुक्राचार्य इस भक्तियोग में बाधा डालने के लिए भौतिक तर्क प्रस्तुत कर रहे थे। ऐसी परिस्थिति में बलि महाराज ने निर्णय लिया कि ऐसी बाधाओं से बचा जाना चाहिए। दूसरे शब्दों में, उन्होंने तुरन्त ही शुक्राचार्य की राय को अस्वीकार करने और अपना कर्तव्य पालने का निर्णय लिया। इस तरह उन्होंने भगवान् वामनदेव को अपना सर्वस्व अर्पित कर दिया।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥