श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 21: भगवान् द्वारा बलि महाराज को बन्दी बनाया जाना  »  श्लोक 2-3

 
श्लोक
वेदोपवेदा नियमा यमान्विता-
स्तर्केतिहासाङ्गपुराणसंहिता: ।
ये चापरे योगसमीरदीपित-
ज्ञानाग्निना रन्धितकर्मकल्मषा: ॥ २ ॥
ववन्दिरे यत्स्मरणानुभावत:
स्वायम्भुवं धाम गता अकर्मकम् ।
अथाङ्‍‍घ्रये प्रोन्नमिताय विष्णो-
रुपाहरत् पद्मभवोऽर्हणोदकम् ।
समर्च्य भक्त्याभ्यगृणाच्छुचिश्रवा
यन्नाभिपङ्केरुहसम्भव: स्वयम् ॥ ३ ॥
 
शब्दार्थ
वेद—चारों वेद (साम, यजुर्, ऋग् तथा अथर्व), भगवान् द्वारा प्रदत्त मूल ज्ञान; उपवेदा:—पूरक तथा गौण वैदिक ज्ञान यथा आयुर्वेद, धनुर्वेद; नियमा:—विधि-विधान; यम—संयम करने की विधियाँ; अन्विता:—ऐसे मामलों में पटु; तर्क—तर्क; इतिहास—इतिहास; अङ्ग—वैदिक शिक्षा; पुराण—पुराण; संहिता:—संहिताएँ यथा ब्रह्म-संहिता, वेदों के पूरक ग्रंथ; ये— अन्य; च—भी; अपरे—ब्रह्मा तथा उनके पार्षदों के अतिरिक्त; योग-समीर-दीपित—योगाभ्यास की वायु से प्रज्ज्वलित; ज्ञान- अग्निना—ज्ञान की आग से; रन्धित-कर्म-कल्मषा:—जिनके लिए कर्म का सारा दूषण रुक चुका है; ववन्दिरे—स्तुति की; यत्-स्मरण-अनुभावत:—जिनका ध्यान मात्र करने से; स्वायम्भुवम्—ब्रह्माजी का; धाम—निवास स्थान; गता:—प्राप्त किया था; अकर्मकम्—जो सकाम कर्म से प्राप्त नहीं किया जा सकता; अथ—तत्पश्चात्; अङ्घ्रये—चरणकमलों पर; प्रोन्नमिताय— प्रणाम किया; विष्णो:—विष्णु के; उपाहरत्—पूजा की; पद्म-भव:—कमल से उत्पन्न ब्रह्माजी ने; अर्हण-उदकम्—जल द्वारा अर्घ्य देना; समर्च्य—पूजा करके; भक्त्या—भक्तिपूर्वक; अभ्यगृणात्—उन्हें प्रसन्न किया; शुचि-श्रवा:—परम प्रसिद्ध वैदिक विद्वान; यत्-नाभि-पङ्केरुह-सम्भव: स्वयम्—जिनकी नाभि से निकले कमल से उत्पन्न ब्रह्माजी ।.
 
अनुवाद
 
 जो महापुरुष भगवान् के चरणकमलों की पूजा के लिए आए उनमें वे भी थे जिन्होंने आत्मसंयम तथा विधि-विधानों में सिद्धि प्राप्त की थी। साथ ही वे तर्क, इतिहास, सामान्य शिक्षा तथा कल्प नामक (प्राचीन ऐतिहासिक घटनाओं से सम्बन्धित) वैदिक वाङ्मय में दक्ष थे। अन्य लोग ब्रह्म संहिताओं जैसे वैदिक उपविषयों, वेदों के अन्य ज्ञान तथा वेदांगों (आयुर्वेद, धनुर्वेद, इत्यादि) में पटु थे। अन्य ऐसे थे जिन्होंने योगाभ्यास से जागृत दिव्यज्ञान के द्वारा कर्मफलों से अपने को मुक्त कर लिया था। कुछ ऐसे भी थे जिन्होंने सामान्य कर्म से नहीं प्रत्युत उच्च वैदिक ज्ञान द्वारा ब्रह्मलोक में निवासस्थान प्राप्त किया था। जल तर्पण द्वारा भगवान् के ऊपर उठे चरणकमलों की भक्तिपूर्वक पूजा कर लेने के बाद भगवान् विष्णु की नाभि से निकले कमल से उत्पन्न ब्रह्माजी ने भगवान् की स्तुति की।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥