श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 22: बलि महाराज द्वारा आत्मसमर्पण  »  श्लोक 2

 
श्लोक
श्रीबलिरुवाच
यद्युत्तमश्लोक भवान् ममेरितं
वचो व्यलीकं सुरवर्य मन्यते ।
करोम्यृतं तन्न भवेत् प्रलम्भनं
पदं तृतीयं कुरु शीर्ष्णि मे निजम् ॥ २ ॥
 
शब्दार्थ
श्री-बलि: उवाच—बलि महाराज ने कहा; यदि—यदि; उत्तमश्लोक—हे परमेश्वर; भवान्—आप; मम—मेरा; ईरितम्—वादा किया गया; वच:—वचन, शब्द; व्यलीकम्—झूठे; सुर-वर्य—हे सुरों (देवताओं) में महानतम; मन्यते—ऐसा सोचते हों; करोमि—करूँगा; ऋतम्—सत्य; तत्—वह (वादा); न—नहीं; भवेत्—होगा; प्रलम्भनम्—धोखा; पदम्—पग; तृतीयम्— तीसरा; कुरु—करें; शीर्ष्णि—सिर पर; मे—मेरे; निजम्—अपने चरणकमलों को ।.
 
अनुवाद
 
 बलि महराज ने कहा : हे परमेश्वर, हे सभी देवताओं के परम पूज्य! यदि आप सोचते हैं कि मेरा वचन झूठा हो गया है, तो मैं उसे सत्य बनाने के लिए अवश्य ही भूल सुधार दूँगा। मैं अपने वचन को झूठा नहीं होने दे सकता। अतएव आप कृपा करके अपना तीसरा कमलरूपी पग मेरे सिर पर रखें।
 
तात्पर्य
 बलि महाराज भगवान् वामनदेव की चाल समझ गये थे कि वे देवताओं के पक्षधर भिक्षुक बनकर उनके समक्ष आये थे। यद्यपि भगवान् का उद्देश्य बलि को ठगना था, किन्तु बलि को आनन्द आ रहा था कि भगवान् किस प्रकार अपने भक्त को ठगकर उसको महिमा प्रदान कर रहे हैं। कहा जाता है कि भगवान् बड़े अच्छे हैं और यह सच है। वे चाहे ठगें या पुरस्कृत करें, वे सदैव अच्छे हैं। इसीलिए बलि महाराज ने उन्हें उत्तमश्लोक कहकर सम्बोधित किया। उन्होंने कहा “आपकी प्रशंसा सदा उत्तम श्लोकों से की जाती है। आपने देवताओं की ओर से अपना यह कहकर मुझे ठगने के लिए वेश बदला कि आपको केवल तीन पग भूमि चाहिए, किन्तु बाद में आपने अपना शरीर इस हद तक विस्तारित कर लिया कि आपने अपने दो ही पगों में सारा ब्रह्माण्ड घेर लिया। चूँकि आप अपने भक्तों की ओर से काम कर रहे थे अतएव आप इसे ठगी नहीं मानते है। कोई बात नहीं। मैं भक्त नहीं माना जा सकता। फिर
भी चूँकि आप लक्ष्मीपति होकर भी मेरे पास दान माँगने आये हैं अतएव मुझे यथाशक्ति आपको सन्तुष्ट करना चाहिए। अतएव आप यह न सोचें कि मैं आपको ठगना चाहता था; मुझे तो अपना वचन पूरा करना ही होगा। अब भी मेरे पास एक सम्पत्ति बची है—वह है मेरा शरीर। आपने मेरी सम्पत्ति तो ले ली, किन्तु मेरे पास अपना शरीर अब भी बचा है। अब आपकी तुष्टि के लिए मैं अपना शरीर दे रहा हूँ तो आप अपना तीसरा पग मेरे सिर पर रख लें?” कोई यह पूछ सकता है कि जब भगवान् ने दो ही पगों में पूरा ब्रह्माण्ड घेर लिया तो भला उनके तीसरे पग के लिए बलि महाराज का सिर कैसे पर्याप्त हो सकता था? किन्तु बलि महाराज ने सोचा कि सम्पत्ति की अपेक्षा सम्पत्ति के अधिकारी को बड़ा होना चाहिए। इसलिए यद्यपि भगवान् ने उनकी सारी सम्पत्ति ले ली थी तो भी सम्पत्ति के अधिकारी बलि महाराज का सिर भगवान् के तीसरे पग के लिए पर्याप्त स्थान प्रदान कर सकेगा।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥