श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 22: बलि महाराज द्वारा आत्मसमर्पण  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक
श्रीविन्ध्यावलिरुवाच
क्रीडार्थमात्मन इदं त्रिजगत् कृतं ते
स्वाम्यं तु तत्र कुधियोऽपर ईश कुर्यु: ।
कर्तु: प्रभोस्तव किमस्यत आवहन्ति
त्यक्तह्रियस्त्वदवरोपितकर्तृवादा: ॥ २० ॥
 
शब्दार्थ
श्री-विन्ध्यावलि: उवाच—बलि महाराज की पत्नी विन्ध्यावलि ने कहा; क्रीडा-अर्थम्—लीला के लिए; आत्मन:—अपनी; इदम्—यह; त्रि-जगत्—तीनों लोक (ब्रह्माण्ड); कृतम्—उत्पन्न किया गया; ते—आपके द्वारा; स्वाम्यम्—स्वामित्व; तु— लेकिन; तत्र—तत्पश्चात्; कुधिय:—मूर्खजन; अपरे—अन्य; ईश—हे परम पालक, हे प्रभु; कुर्यु:—स्थापित किया है; कर्तु:— परमस्रष्टा के लिए; प्रभो:—परम पालक के लिए; तव—तुम्हारे लिए; किम्—क्या; अस्यत:—परम संहारक को; आवहन्ति— अर्पित कर सकते हैं; त्यक्त-ह्रिय:—निर्लज्ज, बुद्धिहीन; त्वत्—आपके द्वारा; अवरोपित—अल्पज्ञान के कारण आरोपित; कर्तृ वादा:—ऐसे मूर्खों का स्वामित्व ।.
 
अनुवाद
 
 श्रीमती विन्ध्यावलि ने कहा : हे प्रभु! आपने निजी लीलाओं का आनन्द उठाने के लिए सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की रचना की है, किन्तु मूर्ख तथा बुद्धिहीन व्यक्तियों ने भौतिक भोग के लिए उस पर अपना स्वामित्व जताया है। निस्सन्देह, वे निर्लज्ज संशयवादी हैं। वे झूठे ही स्वामित्व जताकर यह सोचते हैं कि वे उसको दान दे सकते हैं और भोग सकते हैं। ऐसी दशा में भला वे आपकी कौन सी भलाई कर सकते हैं, जो इस ब्रह्माण्ड के स्वतंत्र स्रष्टा, पालक तथा संहारक हैं?
 
तात्पर्य
 बलि महाराज की पत्नी ने अत्यन्त बुद्धिमती होने के कारण अपने पति के बन्दी बनाये जाने का अनुमोदन किया और उन पर बुद्धिहीन होने का आरोप लगाया क्योंकि उन्होंने भगवान् की सम्पत्ति पर अपना स्वामित्व जताया था। ऐसा दावा आसुरी जीवन का लक्षण है। यद्यपि देवतागण, जिन्हें भगवान् ने व्यवस्था चलाने के लिए कर्मचारी नियुक्त किया है, भौतिक भोगों के प्रति आसक्त रहते हैं, किन्तु वे कभी भी ब्रह्माण्ड पर अपना स्वामित्व नहीं जताते क्योंकि उन्हें ज्ञात है कि हर वस्तु का वास्तविक स्वामी भगवान् है। देवताओं की यह योग्यता है। किन्तु असुरगण भगवान् के एकाधिकार को स्वीकार न करने के बजाये राष्ट्रीयता की हद-बन्दी के माध्यम से ब्रह्माण्ड की सम्पत्ति का दावा करते हैं। वे कहते हैं, “यह अंश मेरा है, यह अंश तुम्हारा है। मैं इस भाग को दान में दे सकता हूँ और इस भाग को निजी भोग के लिए रख सकता हूँ।” ये सब आसुरी धारणाएँ हैं। इसका वर्णन भगवद्गीता (१६.१३) में हुआ है—इदम् अद्य मया लब्धम् इमं प्राप्स्ये मनोरथम्—अभी तक मैंने इतना धन तथा इतनी भूमि प्राप्त की है। अब मुझे इसमें और भी वृद्धि करनी है। इस प्रकार मैं सबसे बड़ा स्वामी बन जाऊँगा। भला मेरी बराबरी कौन कर सकता है? ये सब आसुरी विचार हैं।

बलि महाराज की पत्नी ने अपने पति पर यह दोष लगाया कि यद्यपि भगवान् ने उन पर असामान्य अनुग्रह करके उन्हें बन्दी बनाया है और यद्यपि वे भगवान् के तीसरे पग के लिए अपना शरीर अर्पित कर रहे हैं, किन्तु वे फिर भी अज्ञान के अंधकार में हैं। वास्तव में वह शरीर उनका नहीं है, किन्तु दीर्घकालीन आसुरी मनोवृत्ति के कारण वे इसे समझ नहीं पाये। उन्होंने सोचा कि वे अपने दान के वचन को पूरा न कर पाने से अपयश के भागी हुए हैं और चूँकि शरीर उनका है अतएव वे अपना शरीर दान देकर इस अपयश से मुक्त हो जायेंगे। किन्तु वास्तविकता तो यह है कि शरीर किसी का न होकर भगवान् का है क्योंकि उन्हीं ने यह शरीर प्रदान किया है। जैसाकि भगवद्गीता (१८.६१) में कहा गया है—

ईश्वर: सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति।

भ्रामयन् सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया ॥

भगवान् हर एक के हृदय में विराजमान हैं और वे अपनी माया शक्ति के द्वारा जीव को उसकी इच्छानुसार एक विशेष प्रकार का यंत्र अर्थात् शरीर प्रदान करते हैं। यह शरीर वास्तव में उस जीव का नहीं होता अपितु वह भगवान् का है। ऐसी दशा में बलि महाराज शरीर को अपना कैसे कह सकते थे? इस प्रकार बलि महाराज की बुद्धिमती पत्नी विन्ध्यावलि ने प्रार्थना की कि भगवान् अपनी अहैतुकी कृपा से उनके पति को छोड़ दें। अन्यथा बलि महाराज क्या थे—एक लज्जाहीन असुर जिन्हें त्यक्तह्रियस्त्वदवरोपितकर्तृवादा: कहा गया है अर्थात् ऐसा मूर्ख व्यक्त जो परम पुरुष की सम्पत्ति पर अपना स्वामित्व जता रहा हो। इस कलियुग में ऐसे निर्लज्ज बुद्धिहीनों की जो भगवान् के अस्तित्व में विश्वास नहीं रखते संख्या बढ़ गई है। भगवान् की सत्ता का उल्लंघन करने के प्रयास में तथाकथित विज्ञानी, दार्शनिक तथा राजनीतिज्ञ विश्व के विनाश की योजनाएँ तैयार करते रहते हैं। वे विश्व कल्याण के लिए कुछ भी नहीं कर सकते और दुर्भाग्यवश कलियुग के कारण उन्होंने विश्व के मामलों को अव्यवस्थित कर दिया है। इस तरह उन अबोध लोगों के लाभ के लिए, जो ऐसे असुरों के प्रचार द्वारा भ्रमित हो रहे हैं, कृष्णभावनामृत आन्दोलन की नितान्त आवश्यकता है। यदि वर्तमान स्थिति को इसी रूप में रहने दिया गया तो लोगों को इन असुर दुर्बुद्धियों के नायकत्व में अधिकाधिक कष्ट झेलने होंगे।

 
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