श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 22: बलि महाराज द्वारा आत्मसमर्पण  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक
मानस्तम्भनिमित्तानां जन्मादीनां समन्तत: ।
सर्वश्रेय:प्रतीपानां हन्त मुह्येन्न मत्पर: ॥ २७ ॥
 
शब्दार्थ
मान—झूठी प्रतिष्ठा का; स्तम्भ—इस धृष्टता के कारण; निमित्तानाम्—कारणों का; जन्म-आदीनाम्—उच्चकुल में जन्म इत्यादि; समन्तत:—सब मिलाकर; सर्व-श्रेय:—जीवन के परम लाभ के लिए; प्रतीपानाम्—बाधाओं का; हन्त—भी; मुह्येत्— मोहग्रस्त हो जाता है; न—नहीं; मत्-पर:—मेरा अनन्य भक्त ।.
 
अनुवाद
 
 यद्यपि उच्चकुल में जन्म एवं ऐसे अन्य ऐश्वर्य भक्ति की उन्नति में बाधक होते हैं क्योंकि ये झूठी प्रतिष्ठा तथा घमंड के कारण हैं, किन्तु ये ऐश्वर्य भगवान् के अनन्य भक्त को कभी विचलित नहीं करते।
 
तात्पर्य
 ध्रुव महाराज जैसे भक्तों पर जिन्हें असीम भौतिक ऐश्वर्य प्राप्त था, भगवान् की विशेष कृपा होती है। एक बार कुवेर ने ध्रुव महाराज को एक वर देना चाहा, किन्तु ध्रुव ने उनसे यही याचना की कि मैं भगवान् की भक्ति करता रहूँ यद्यपि वे चाहते तो उनसे कितना ही भौतिक ऐश्वर्य माँग सकते थे। जब भक्त भगवान् ऐश्वर्य की भक्ति में स्थिर होता है, तो भगवान् को उसे उसके भौतिक ऐश्वर्य से वंचित करने की आवश्यकता नहीं रहती। भगवान् भक्ति के कारण अर्जित धन को कभी नहीं छीनते यद्यपि वे कभी-कभी पुण्य कर्मों के द्वारा अर्जित धन को हर लेते हैं। वे ऐसे भक्त को घमण्ड-रहित करने के लिए या उसे भक्ति के बेहतर पद पर स्थित करने के लिए करते हैं। यदि किसी विशेष भक्त का कार्य प्रचार करना हो, किन्तु यदि वह अपने पारिवारिक जीवन या ऐश्वर्य को त्यागकर भगवत्सेवा नहीं करता तो भगवान् निश्चित रूप से उसका भौतिक ऐश्वर्य छीन लेते हैं और उसे भक्ति में स्थापित कर देते हैं। इस तरह शुद्ध भक्त कृष्णभावनामृत के पूर्ण प्रचार कार्य में लग जाता है।
 
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