श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 22: बलि महाराज द्वारा आत्मसमर्पण  »  श्लोक 5

 
श्लोक
त्वं नूनमसुराणां न: परोक्ष: परमो गुरु: ।
यो नोऽनेकमदान्धानां विभ्रंशं चक्षुरादिशत् ॥ ५ ॥
 
शब्दार्थ
त्वम्—तुम; नूनम्—निस्सन्देह; असुराणाम्—असुरों का; न:—हम जिस तरह हैं; परोक्ष:—अप्रत्यक्ष; परम:—परम; गुरु:— गुरु; य:—जो (आप); न:—हमारा; अनेक—कई; मद-अन्धानाम्—भौतिक ऐश्वर्य से अन्धा बना; विभ्रंशम्—हमारी मिथ्या प्रतिष्ठा को विनष्ट करके; चक्षु:—ज्ञान का नेत्र; आदिशत्—दिया ।.
 
अनुवाद
 
 चूँकि आप हम असुरों के अप्रत्यक्ष रूप से महानतम शुभचिन्तक हैं, आप हमारे शत्रु का वेश धारण करके भी हमारे सर्वोच्च कल्याण के लिए कर्म करते हैं। चूँकि हम-जैसे असुर सदैव मिथ्या प्रतिष्ठा का पद पाने की महत्त्वाकांक्षा करते हैं, अतएव आप हमें दण्डित करके हमारे ज्ञान-नेत्र खोलते हैं जिनसे हम सन्मार्ग देख सकें।
 
तात्पर्य
 बलि महाराज ने भगवान् को देवताओं की अपेक्षा असुरों का मित्र अधिक समझा। इस भौतिक जगत में जिसे जितना ही अधिक धन मिलता है, वह उतना ही अधिक आध्यात्मिक जीवन के प्रति अन्धा बन जाता है। देवतागण भौतिक सम्पत्ति के लिए भगवान् के भक्त हैं किन्तु यद्यपि भगवान् प्रत्यक्ष रूप
से असुरों के पक्ष में नहीं रहते फिर-भी वे उन्हें मिथ्या-प्रतिष्ठा के पदों से वंचित करके उनके शुभचिन्तक के रूप में कार्य करते हैं। चूँकि मिथ्या प्रतिष्ठा से लोग दिग्भ्रमित हो जाते हैं इसलिए भगवान् उन पर विशेष कृपा करके उनकी मिथ्या-प्रतिष्ठा को हर लेते हैं।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥