श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 23: देवताओं को स्वर्गलोक की पुनर्प्राप्ति  »  श्लोक 10

 
श्लोक
नित्यं द्रष्टासि मां तत्र गदापाणिमवस्थितम् ।
मद्दर्शनमहाह्लादध्वस्तकर्मनिबन्धन: ॥ १० ॥
 
शब्दार्थ
नित्यम्—निरन्तर; द्रष्टा—देखने वाला; असि—हो; माम्—मुझको; तत्र—वहाँ (सुतललोक में); गदा-पाणिम्—हाथ में गदा लिए; अवस्थितम्—वहाँ स्थित; मत्-दर्शन—उस रूप में मेरा दर्शन करके; महा-आह्लाद—दिव्य आनन्द से; ध्वस्त—विनष्ट; कर्म-निबन्धन:—सकाम कर्मों का बन्धन ।.
 
अनुवाद
 
 भगवान् ने प्रह्लाद महाराज को आश्वासन दिया कि तुम वहाँ पर हाथों में शंख, चक्र, गदा तथा कमल लिए मेरे नित्य रूप का दर्शन कर सकोगे। वहाँ मेरे निरन्तर प्रत्यक्ष दर्शन से दिव्य आनन्द प्राप्त करके तुम और अधिक कर्म-बन्धन में नहीं पड़ोगे।
 
तात्पर्य
 कर्मबन्धन में जन्म तथा मृत्यु का पिष्टपेषण होता है। मनुष्य इस तरह सकाम कर्म करता है कि वह अपने अगले जीवन के लिए एक दूसरा शरीर बना लेता है। जब तक वह सकाम कर्म में लिप्त रहता है उसे दूसरा भौतिक शरीर स्वीकार करना पड़ता है। भौतिक शरीरों की यह बारम्बार स्वीकृति संसार बन्धन
कहलाती है। इसे रोकने के लिए भक्त को सलाह दी जाती है कि वह निरन्तर भगवान् का दर्शन करे। इसलिए कनिष्ठ अधिकारी या नवदीक्षित भक्त को प्रतिदिन मंदिर जाने और नियमित रूप से भगवान् के स्वरूप का दर्शन करने की सलाह दी जाती है। इस प्रकार नवदीक्षित भक्त कर्मबन्धन से छूट सकता है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥