श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 23: देवताओं को स्वर्गलोक की पुनर्प्राप्ति  »  श्लोक 25

 
श्लोक
प्राप्य त्रिभुवनं चेन्द्र उपेन्द्रभुजपालित: ।
श्रिया परमया जुष्टो मुमुदे गतसाध्वस: ॥ २५ ॥
 
शब्दार्थ
प्राप्य—प्राप्त करके; त्रि-भुवनम्—तीनों लोक; च—भी; इन्द्र:—स्वर्ग के राजा ने; उपेन्द्र-भुज-पालित:—उपेन्द्र अर्थात् वामनदेव के बाहुबल से रक्षित होकर; श्रिया—ऐश्वर्य के द्वारा; परमया—परम; जुष्ट:—सेवा किया गया; मुमुदे—भोग किया; गत-साध्वस:—असुरों के भय से रहित ।.
 
अनुवाद
 
 इस प्रकार भगवान् वामनदेव की बाहुओं से रक्षित होकर स्वर्ग के राजा इन्द्र ने तीनों लोकों का अपना राज्य पुन: प्राप्त कर लिया और निर्भय होकर तथा पूर्णतया सन्तुष्ट होकर वे अपने परम ऐश्वर्यशाली पद पर पुन: प्रतिष्ठित कर दिए गए
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥