श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 24: भगवान् का मत्स्यावतार  »  श्लोक 15

 
श्लोक
तमात्मनोऽनुग्रहार्थं प्रीत्या मत्स्यवपुर्धरम् ।
अजानन् रक्षणार्थाय शफर्या: स मनो दधे ॥ १५ ॥
 
शब्दार्थ
तम्—उस; आत्मन:—निजी; अनुग्रह-अर्थम्—अनुग्रह दिखाने के लिए; प्रीत्या—अत्यधिक प्रसन्न होकर; मत्स्य-वपु:-धरम्— मछली का शरीर धारण करने वाले भगवान् को; अजानन्—बिना जाने; रक्षण-अर्थाय—रक्षा करने के लिए; शफर्या:—मछली की; स:—उस राजा ने; मन:—मन में; दधे—निश्चय किया ।.
 
अनुवाद
 
 राजा सत्यव्रत ने यह न जानते हुए कि यह मछली भगवान् है अपनी प्रसन्नता के लिए सहर्ष उस मछली को संरक्षण प्रदान करने का निर्णय लिया।
 
तात्पर्य
 यहाँ पर बिना जाने भगवान् की सेवा करने का दृष्टान्त प्रस्तुत है। ऐसी सेवा अज्ञात सुकृति कहलाती है। राजा सत्यव्रत ने अपनी दया दिखानी चाही; उसे पता न था कि
यह मछली भगवान् विष्णु है। ऐसी अज्ञात भक्ति से भगवान् की कृपा प्राप्त होती है। भगवान् की सेवा चाहे ज्ञात भाव से हो या अज्ञात से, कभी व्यर्थ नहीं जाती।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥