श्रीमद् भागवतम
शब्द आकार

भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 24: भगवान् का मत्स्यावतार  »  श्लोक 31

 
श्लोक
श्रीशुक उवाच
इति ब्रुवाणं नृपतिं जगत्पति:
सत्यव्रतं मत्स्यवपुर्युगक्षये ।
विहर्तुकाम: प्रलयार्णवेऽब्रवी-
च्चिकीर्षुरेकान्तजनप्रिय: प्रियम् ॥ ३१ ॥
 
शब्दार्थ
श्री-शुक: उवाच—श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; इति—इस प्रकार; ब्रुवाणम्—बोलते हुए; नृपतिम्—राजा को; जगत्- पति:—सम्पूर्ण विश्व के स्वामी; सत्यव्रतम्—सत्यव्रत को; मत्स्य-वपु:—मत्स्य का शरीर धारण करने वाले भगवान् ने; युग- क्षये—युग के अन्त में; विहर्तु-काम:—अपनी लीलाओं का भोग करने के लिए; प्रलय-अर्णवे—बाढ़ के जल में; अब्रवीत्— कहा; चिकीर्षु:—करने का इच्छुक; एकान्त-जन-प्रिय:—भक्तों के परम प्रिय; प्रियम्—अत्यन्त लाभप्रद वस्तु ।.
 
अनुवाद
 
 शुकदेव गोस्वामी ने कहा : जब राजा सत्यव्रत ने इस तरह कहा तो अपने भक्त को लाभ पहुँचाने तथा बाढ़ के जल में अपनी लीलाओं का आनन्द उठाने के लिए युग के अन्त में मछली का रूप धारण करने वाले भगवान् ने इस प्रकार उत्तर दिया।
 
____________________________
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥