श्रीमद् भागवतम
शब्द आकार

भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 24: भगवान् का मत्स्यावतार  »  श्लोक 38

 
श्लोक
मदीयं महिमानं च परं ब्रह्मेति शब्दितम् ।
वेत्स्यस्यनुगृहीतं मे सम्प्रश्नैर्विवृतं हृदि ॥ ३८ ॥
 
शब्दार्थ
मदीयम्—मेरी; महिमानम्—महिमा; च—तथा; परम् ब्रह्म—परम ब्रह्म, परम सत्य; इति—इस प्रकार; शब्दितम्—विख्यात; वेत्स्यसि—तुम समझोगे; अनुगृहीतम्—कृपा पाकर; मे—मेरे द्वारा; सम्प्रश्नै:—प्रश्नों के द्वारा; विवृतम्—पूर्णतया व्याख्या किया गया; हृदि—हृदय में ।.
 
अनुवाद
 
 मैं तुम्हें ठीक से सलाह दूँगा और तुम्हारा पक्ष भी लूँगा और मुझ परब्रह्म की महिमाओं के विषय में तुम्हारी जिज्ञासाओं के कारण हर बात तुम्हारे हृदय के भीतर प्रकट होगी। इस तरह तुम मेरे विषय में सब कुछ जान लोगे।
 
तात्पर्य
 जैसाकि भगवद्गीता (१५.१५) में कहा गया है—सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो मत्त: स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च—परमात्मा सबों के हृदयों में स्थित हैं और उन्हीं से स्मृति, ज्ञान तथा विस्मृति आती है। जो जितना शरणागत होता है उसी अनुपात में भगवान् अपने को प्रकट करते हैं। ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्। आदान-प्रदान के सहयोग में भगवान् मनुष्य की शरणागति के अनुपात में अपने को प्रकट करते हैं। जो पूरी तरह शरण में आता है उसे आंशिक रूप से शरण में आने वाले की तुलना में भिन्न रूप में प्राकट्य किया जाता है। हर व्यक्ति स्वभावत: प्रत्यक्ष था अप्रत्यक्ष रूप से भगवान् की शरण में जाता है। बद्धजीव संसार में प्रकृति के नियमों के प्रति भौतिक रूप से आत्म- समर्पण करता है, किन्तु जो व्यक्ति पूर्णरूपेण भगवान् की शरण में जाता है उस पर भौतिक प्रकृति का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। ऐसे पूर्ण शरणागत व्यक्ति पर भगवान् प्रत्यक्षत: कृपा करते हैं। मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते। जो पूर्णतया भगवान् की शरण में जाता है उसे प्रकृति के गुणों का भय नहीं रह जाता क्योंकि हर वस्तु भगवान् की महिमा का विस्तार मात्र है (सर्वं खल्विदं ब्रह्म) और ये महिमाएँ क्रमश: प्रकट होती हैं और अनुभव की जाती हैं। भगवान् परम शुद्धिकर्ता हैं (परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान्)। जो जितना ही पवित्र हो जाता है और ब्रह्म के बारे में जितना अधिक जानना चाहता है, भगवान् उसके समक्ष उतना ही अधिक प्रकट करते हैं। शुद्ध भक्तों को ब्रह्म, परमात्मा तथा भगवान् का पूर्ण ज्ञान प्रकट किया जाता है। भगवान् भगवद्गीता (१०.११) में कहते हैं—
तेषामेवानुकम्पार्थम् अहं अज्ञानजं तम:।

नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता ॥

“मैं उन पर कृपा करके उनके हृदयों में बस कर, ज्ञान के चमकते हुए दीप से अज्ञानजन्य अंधकार को विनष्ट कर देता हूँ।”

____________________________
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥