श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 24: भगवान् का मत्स्यावतार  »  श्लोक 48

 
श्लोक
यत्सेवयाग्नेरिव रुद्ररोदनं
पुमान् विजह्यान्मलमात्मनस्तम: ।
भजेत वर्णं निजमेष सोऽव्ययो
भूयात् स ईश: परमो गुरोर्गुरु: ॥ ४८ ॥
 
शब्दार्थ
यत्-सेवया—जिस (भगवान् की) सेवा से; अग्ने:—अग्नि के स्पर्श में; इव—मानो; रुद्र-रोदनम्—चाँदी या सोने का टुकड़ा पवित्र हो जाता है; पुमान्—पुरुष; विजह्यात्—त्याग सकता है; मलम्—संसार की सारी गंदी वस्तुओं को; आत्मन:—अपनी; तम:—तमोगुण, जिसके अन्तर्गत मनुष्य पवित्र तथा अपवित्र कर्म करता है; भजेत—असली रूप को प्राप्त करता है; वर्णम्— मूल पहचान; निजम्—अपनी; एष:—ऐसा; स:—वह; अव्यय:—अव्यय; भूयात्—हो; स:—वह; ईश:—भगवान्; परम:— परम; गुरो: गुरु:—गुरुओं के गुरु ।.
 
अनुवाद
 
 भवबन्धन से जो छूटना चाहता है उसे भगवान् की सेवा करनी चाहिए और पवित्र तथा अपवित्र कर्मों से युक्त तमोगुण का संसर्ग छोड़ देना चाहिए। इस तरह मनुष्य को अपनी मूल पहचान फिर से प्राप्त होती है, जिस प्रकार अग्नि में तपाने पर चाँदी या सोने का टुकड़ा अपना सारा मल छुड़ा कर शुद्ध हो जाता है। ऐसे अव्यय भगवान्! आप हमारे गुरु बनें क्योंकि आप अन्य सभी गुरुओं के आदि गुरु हैं।
 
तात्पर्य
 मनुष्य जीवन अपने को शुद्ध बनाने के लिए तपस्या करने के निमित्त है। तपो दिव्यं पुत्रका येन सत्त्वं शुद्ध्येत। प्रकृति के गुणों के कल्मष के कारण मनुष्य जन्म-मृत्यु के चक्र में पड़ा रहता है (कारणं गुणसङ्गोऽस्य सद्असद्-योनिजन्मसु); अतएव मनुष्य जीवन का उद्देश्य इस कल्मष से अपने को शुद्ध करना है, जिससे उसे अपना आध्यात्मिक स्वरूप पुन: प्राप्त हो सके और जन्म-मृत्यु के इस चक्र में उसे न पडऩा पड़े। कल्मषहीन बनने की संस्तुत विधि है भगवान् की भक्ति। आत्म- साक्षात्कार की अनेक विधियाँ हैं यथा कर्म, ज्ञान तथा योग, किन्तु इनमें से कोई भी भक्ति की विधि के तुल्य नहीं है। जिस प्रकार सोने तथा चाँदी के मल को मात्र जल से धोकर नहीं, अपितु अग्नि में तपाकर दूर किया जा सकता है उसी प्रकार जीव को भक्ति के द्वारा उसके मूल स्वरूप में जागृत किया जा सकता है (यत्सेवया), कर्म, ज्ञान या योग से नहीं। चिन्तनपरक ज्ञान या योगासन प्रक्रिया से कोई लाभ नहीं हो सकता।
वर्णम् शब्द किसी के मूल स्वरूप की कान्ति को बताता है। चाँदी या सोने की मूल कान्ति चमकीली होती है। इसी प्रकार जीव की मूल कान्ति आनन्द की कान्ति है क्योंकि जीव सच्चिदानन्द विग्रह का अंशरूप है। आनन्दमयोऽभ्यासात्। सच्चिदानन्द विग्रह अर्थात् कृष्ण का अंश होने के कारण प्रत्येक जीव को आनन्दमय होने का अधिकार है। तो फिर प्रकृति के भौतिक गुणों द्वारा मलीन कल्मष के कारण जीव कष्ट क्यों उठाये? जीव को चाहिए कि शुद्ध हो और अपना मूल स्वरूप फिर से प्राप्त करे। ऐसा वह भक्ति द्वारा ही कर सकता है। इसलिए मनुष्य को भगवान् की शिक्षाएँ ग्रहण करनी चाहिए जिन्हें यहाँ गुरोर्गुरु: अर्थात् गुरुओं का गुरु कहा गया है।

भले ही हमें भगवान् से प्रत्यक्ष सम्पर्क करने का सौभाग्य प्राप्त न हो, किन्तु भगवान् का प्रतिनिधि साक्षात् भगवान् जैसा होता है क्योंकि ऐसा प्रतिनिधि ऐसा कुछ भी नहीं कहता जो भगवान् द्वारा न कहा गया हो। इसलिए चैतन्य महाप्रभु ने गुरु की यह परिभाषा दी है—यारे देख, तारे कह ‘कृष्ण’- उपदेश—प्रामाणिक गुरु वह है, जो अपने शिष्यों को कृष्ण द्वारा कहे गये सिद्धान्तों के अनुसार उपदेश देता है। प्रामाणिक गुरु वह है, जिसने कृष्ण को गुरु स्वीकार किया है। यह गुरु-परम्परा प्रणाली है। आदि गुरु तो व्यासदेव हैं क्योंकि वे भगवद्गीता तथा श्रीमद्भागवत के वक्ता हैं जिनमें लिखी सारी बातें कृष्ण से सम्बन्ध रखती हैं। अतएव गुरुपूजा को व्यासपूजा कहा जाता है। अन्तत: आदि गुरु कृष्ण हैं, नारद उनके शिष्य हैं और व्यास नारद के शिष्य हैं। इस प्रकार क्रमश: गुरु-परम्परा प्राप्त होती है। कोई व्यक्ति गुरु नहीं बन सकता यदि वह यह नहीं जानता कि कृष्ण या उनके अवतार क्या चाहते हैं। गुरु का सन्देश भगवान् का सन्देश है और वह संदेश है सारे विश्व में कृष्णभावनामृत का प्रसार।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥