श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 3: गजेन्द्र की समर्पण-स्तुति  »  श्लोक 16

 
श्लोक
गुणारणिच्छन्नचिदुष्मपाय
तत्क्षोभविस्फूर्जितमानसाय ।
नैष्कर्म्यभावेन विवर्जितागम-
स्वयंप्रकाशाय नमस्करोमि ॥ १६ ॥
 
शब्दार्थ
गुण—प्रकृति के तीन गुणों (सत्त्व, रजस् तथा तमस्) द्वारा; अरणि—अरणि काष्ठ द्वारा; छन्न—आवृत; चित्—ज्ञान का; उष्मपाय—उसको जिसकी अग्नि; तत्-क्षोभ—प्रकृति के तीनों गुणों के क्षोभ से; विस्फूर्जित—बाहर; मानसाय—उसको जिसका मन; नैष्कर्म्य-भावेन—आध्यात्मिक ज्ञान की अवस्था के कारण; विवर्जित—त्याग देने वालों में; आगम—वैदिक सिद्धान्त; स्वयम्—स्वयं; प्रकाशाय—जो प्रकट है उसको; नम: करोमि—मैं सादर नमस्कार करता हूँ ।.
 
अनुवाद
 
 हे प्रभु! जिस प्रकार अरणि-काष्ठ में अग्नि ढकी रहती है उसी प्रकार आप तथा आपका असीम ज्ञान प्रकृति के भौतिक गुणों से ढका रहता है। किन्तु आपका मन प्रकृति के गुणों के कार्यकलापों पर ध्यान नहीं देता। जो लोग आध्यात्मिक ज्ञान में बढ़े-चढ़े हैं, वे वैदिक वाङ्मय में निर्देशित विधि-विधानों के अधीन नहीं होते। चूँकि ऐसे उन्नत लोग दिव्य होते हैं अतएव आप स्वयं उनके शुद्ध मनों में प्रकट होते हैं। इसलिए मैं आपको सादर नमस्कार करता हूँ।
 
तात्पर्य
 भगवद्गीता (१०.११) में कहा गया है—
तेषां एवानुकम्पार्थम् अहं अज्ञानजं तम:।

नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता ॥

जिस भक्त ने अपने हृदय में भगवान् के चरणकमलों को धारण कर रखा है उसे भगवान् भीतर से विशेष कृपा करके ज्ञानदीप नामक दिव्य प्रकाश प्रदान करते हैं। इस ज्ञानदीप की तुलना अरणि-काष्ठ के भीतर छिपी अग्नि से की गई है। पूर्वकाल में यज्ञ सम्पन्न करने के लिए ऋषिगण सीधे अग्नि नहीं जलाते थे; अग्नि का आवाहन अरणि-काष्ठ से किया जाता था। इसी प्रकार सारे जीव प्रकृति के गुणों से आच्छन्न हैं तथा ज्ञान की अग्नि (ज्ञानदीप) भगवान् द्वारा ही जलाई जा सकती है यदि उन्हें कोई अपने हृदय में धारण करे। स वै मन: कृष्णपदारविन्दयो:। यदि कोई अपने हृदय के भीतर स्थित कृष्ण के चरणकमलों की शरण गम्भीरतापूर्वक ग्रहण करता है, तो भगवान् सारे अज्ञान का उच्छेदन कर देते हैं। ज्ञान के दीप से मनुष्य विशेष भगवत्कृपा के कारण तुरन्त ही सब कुछ उचित रूप से समझ लेता है और स्वरूपसिद्ध बन जाता है। दूसरे शब्दों में, बाह्य रूप से सुशिक्षित न होने पर भी भक्त को भक्ति के कारण भगवान् भीतर से प्रकाश देते हैं। यदि भगवान् भीतर से प्रकाश दें तो भला कोई अज्ञान में कैसे रह सकता है? अतएव मायावादियों का यह दोषारोपण कि भक्ति का मार्ग बुद्धिहीन या अशिक्षित के लिए है सत्य नहीं उतरता।

यस्यास्ति भक्तिर्भगवत्यकिञ्चना सर्वैर्गुणैस्तत्र समासते सुरा: (भागवत ५.१८.१२) यदि कोई भगवान् का अनन्य भक्त बन जाता है, तो उसमें सारे सद्गुण स्वत: आ जाते हैं। ऐसा भक्त वेदों के उपदेशों से ऊपर होता है। वह परमहंस होता है। वैदिक वाङ्मय का अवगाहन किये बिना भी भक्त भगवत्कृपा से शुद्ध तथा प्रबुद्ध हो जाता है। भक्त कहता है “अतएव हे प्रभु! मैं आपको सादर नमस्कार करता हूँ।”

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥