श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 3: गजेन्द्र की समर्पण-स्तुति  »  श्लोक 25

 
श्लोक
जिजीविषे नाहमिहामुया कि-
मन्तर्बहिश्चावृतयेभयोन्या ।
इच्छामि कालेन न यस्य विप्लव-
स्तस्यात्मलोकावरणस्य मोक्षम् ॥ २५ ॥
 
शब्दार्थ
जिजीविषे—दीर्घकाल तक रहने की इच्छा; न—नहीं; अहम्—मैं; इह—इस जीवन में; अमुया—या अगले जीवन में (इस संकट से बच जाने पर मैं जीना नहीं चाहता); किम्—क्या लाभ; अन्त:—भीतर से; बहि:—बाहर से; च—तथा; आवृतया— अज्ञान से आच्छादित; इभ-योन्या—हाथी रूप इस जन्म में; इच्छामि—मेरी इच्छा है; कालेन—काल के प्रभाव से; न—नहीं है; यस्य—जिसका; विप्लव:—संहार; तस्य—उस; आत्म-लोक-आवरणस्य—आत्म-साक्षात्कार के आवरण से; मोक्षम्—मोक्ष ।.
 
अनुवाद
 
 घडिय़ाल के आक्रमण से मुक्त किये जाने के बाद मैं और आगे जीवित रहना नहीं चाहता। हाथी के शरीर से क्या लाभ जो भीतर तथा बाहर से अज्ञान से आच्छादित हो? मैं तो अज्ञान के आवरण से केवल नित्य मोक्ष की कामना करता हूँ। यह आवरण काल के प्रभाव से विनष्ट नहीं होता।
 
तात्पर्य
 इस भौतिक जगत में प्रत्येक जीव अज्ञान के अंधकार से आच्छादित है। इसलिए वेदों का आदेश है कि मनुष्य को गुरु के माध्यम से भगवान् तक पहुँचना चाहिए जिनका वर्णन तथा स्तुति गौतमीय तन्त्र में इस प्रकार की गई है—
ॐ अज्ञानतिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जनशलाकया।

चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्रीगुरवे नम: ॥

“मैं अपने गुरु को सादर नमस्कार करता हूँ जिन्होंने ज्ञान के दीपक से मेरी उन आँखों को खोल दिया है, जो अज्ञान के अंधकार से अंधी हो चुकी थीं।” भले ही मनुष्य इस जगत में जीवन-संघर्ष क्यों न करे, किन्तु उसके लिए सदैव जीवित रह पाना असम्भव है। फिर भी मनुष्य को समझना चाहिए कि यह जीवन-संघर्ष अज्ञान के कारण है, क्योंकि प्रत्येक जीव परमेश्वर का नित्य अंश है। किसी को हाथी या भारतीय या अमरीकी पुरुष के रूप में जीवित रहने की कोई आवश्यकता नहीं है। मनुष्य को जन्म-मृत्यु के चक्कर से मुक्ति प्राप्त करने की एकमात्र कामना करनी चाहिए। अज्ञान के कारण प्रकृति द्वारा प्रदत्त प्रत्येक जीवन को हम सुखी तथा आनन्ददायक मानते हैं, किन्तु इस भौतिक जगत के पतित जीवन में ब्रह्मा से लेकर एक क्षुद्र चींटी तक कोई भी वास्तव में सुखी नहीं है। हम सुखपूर्वक रहने के लिए अनेक योजनाऐ बनाते हैं, किन्तु इस भौतिक जगत में कोई सुखी नहीं हो सकता भले ही हम इस जीवन में या उस जीवन में स्थायी आवास बनाने का कितना ही प्रयत्न क्यों न करें।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥