श्रीमद् भागवतम
शब्द आकार

भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 3: गजेन्द्र की समर्पण-स्तुति  »  श्लोक 27

 
श्लोक
योगरन्धितकर्माणो हृदि योगविभाविते ।
योगिनो यं प्रपश्यन्ति योगेशं तं नतोऽस्म्यहम् ॥ २७ ॥
 
शब्दार्थ
योग-रन्धित-कर्माण:—ऐसे व्यक्ति जिनके सकाम कर्मों के फल भक्तियोग द्वारा जलाये जा चुके हैं; हृदि—हृदय में; योग- विभाविते—पूर्णत: शुद्ध तथा विमल; योगिन:—दक्ष योगी; यम्—भगवान् को; प्रपश्यन्ति—प्रत्यक्ष दर्शन करते हैं; योग- ईशम्—समस्त योग के स्वामी, भगवान् को; तम्—उसको; नत: अस्मि—नमस्कार करता हूँ; अहम्—मैं ।.
 
अनुवाद
 
 मैं उन ब्रह्म, परमात्मा, समस्त योग के स्वामी को सादर नमस्कार करता हूँ जो सिद्ध योगियों द्वारा अपने हृदयों में तब देखे जाते हैं जब उनके हृदय भक्तियोग के अभ्यास द्वारा सकाम कर्मों के फलों से पूर्णतया शुद्ध तथा मुक्त हो जाते हैं।
 
तात्पर्य
 गजेन्द्र ने इतना ही स्वीकार किया कि कोई न कोई ऐसा होगा जिसने इस ब्रह्माण्ड की रचना की है और इसको अवयव प्रदान किये हैं। इतना तो हर एक को, यहाँ तक कि कट्टर नास्तिक को भी मान लेना चाहिए। तो फिर अभक्त तथा सामान्य नास्तिक इसे क्यों नहीं स्वीकार करते? इसका कारण यह है कि वे अपने सकाम कर्मों के फलों से दूषित रहते हैं। मनुष्य को एक के बाद एक सम्पन्न किए गए सकाम कर्मों के फलस्वरूप हृदय में जमी हुई धूल से मुक्त होना चाहिए। उसे भक्तियोग के अभ्यास से इस धूल को धो डालना चाहिए। योगरन्धित कर्माण:। जब तक मनुष्य भौतिक प्रकृति के रजो तथा तमो गुणों से आच्छादित है तब तक भगवान् को जान पाने की कोई सम्भावना नहीं है। तदा रजस्तमो भावा: कामलोभादयश्च ये। जब मनुष्य रजो तथा तमो गुणों से मुक्त हो जाता है, तो वह काम तथा लोभ जैसे निम्नतम दुर्गुणों से मुक्त हो जाता है।
आजकल ऐसी बहुत सी योग की पाठशालाएँ हैं, जो लोगों को योग के अभ्यास से काम तथा लोभ विकसित करने के लिए प्रोत्साहित करती हैं। अतएव लोग तथाकथित योग अभ्यास के लिए अत्यन्त लालायित रहते हैं। किन्तु योग की वास्तविक विधि यहाँ पर वर्णित है। जैसाकि अधिकृत रूप में श्रीमद्भागवत (१२.१३.१) में कहा गया है—ध्यानावस्थित तद्गतेन मनसा पश्यन्ति यं योगिन:—

योगी वह है, जो भगवान् के चरणकमलों का सदैव ध्यान करता है। इसी की पुष्टि ब्रह्म-संहिता (५.३८) में भी हुई है—

प्रेमाञ्जनच्छुरितभक्तिविलोचनेन सन्त: सदैव हृदयेषु विलोकयन्ति।

यं श्यामसुन्दरमचिन्त्यगुणस्वरूपं गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि ॥

“मैं आदि भगवान् गोविन्द की पूजा करता हूँ जो साक्षात् श्यामसुन्दर या कृष्ण हैं, जिनके गुण अचिन्त्य एवं असंख्य हैं, जिन्हें शुद्ध भक्त अपने हृदयों में प्रेम रूपी अञ्जन लगी हुई भक्तिमयी आँखों से देखते हैं।” भक्तियोगी श्यामसुन्दर को—श्याम वर्ण वाले सुन्दर कृष्ण को—निरन्तर देखता है। चूँकि गजेन्द्र अपने को सामान्य पशु समझ रहा था अतएव उसने अपने आपको भगवान् का दर्शन पाने के लिए अयोग्य समझा। विनयवश उसने सोचा कि वह योग का अभ्यास नहीं कर सकता। दूसरे शब्दों में, भला ऐसे लोग जो देहात्मबुद्धि के कारण पशुओं के समान हैं और जिनकी चेतना शुद्ध नहीं है योग का अभ्यास कैसे कर सकते हैं? वर्तमान काल में जिन लोगों की इन्द्रियाँ वश में नहीं हैं, जिन्हें दर्शन का ज्ञान नहीं है और जो धर्म के सिद्धान्तों या विधि-विधानों का पालन नहीं करते, वे भी योगी होने का अभिनय करते हैं। योग अभ्यास में यह सबसे बड़ी विडम्बना है।

____________________________
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥