श्रीमद् भागवतम
शब्द आकार

भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 3: गजेन्द्र की समर्पण-स्तुति  »  श्लोक 3

 
श्लोक
यस्मिन्निदं यतश्चेदं येनेदं य इदं स्वयम् ।
योऽस्मात् परस्माच्च परस्तं प्रपद्ये स्वयम्भुवम् ॥ ३ ॥
 
शब्दार्थ
यस्मिन्—जिस मूल पद पर; इदम्—यह ब्रह्माण्ड टिका है; यत:—जिन अवयवों से; च—तथा; इदम्—यह विराट विश्व बना है; येन—जिसके द्वारा; इदम्—यह विराट विश्व रचित तथा पालित है; य:—जो; इदम्—यह भौतिक जगत है; स्वयम्—स्वयं; य:—जो; अस्मात्—इस भौतिक जगत (फल) से; परस्मात्—कारण से; च—तथा; पर:—दिव्य या भिन्न; तम्—उस; प्रपद्ये—शरण में जाता हूँ; स्वयम्भुवम्—आत्म-निर्भर की ।.
 
अनुवाद
 
 भगवान् ही वह परम पद है, जिस पर प्रत्येक वस्तु टिकी हुई है; वे वह अवयव हैं जिससे प्रत्येक वस्तु उत्पन्न हुई है तथा वे वह पुरुष हैं जिसने सृष्टि की रचना की और जो इस विराट विश्व के एकमात्र कारण हैं। फिर भी वे कारण-कार्य से पृथक् हैं। मैं उन भगवान् की शरण ग्रहण करता हूँ जो सभी प्रकार से आत्म-निर्भर हैं।
 
तात्पर्य
 भगवद्गीता (९.४) में भगवान् कहते हैं—मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना—मैं भगवान् हूँ, किन्तु सभी कुछ मेरी शक्ति पर निर्भर है, जिस प्रकार मिट्टी का पात्र मिट्टी पर निर्भर रहता है।” जिस स्थान पर मिट्टी का पात्र टिका रहता है, वह भी मिट्टी है। यह मिट्टी का पात्र कुम्हार द्वारा बनाया जाता है, जिसका शरीर मिट्टी का बना होता है। कुम्हार का चाक, जिससे मिट्टी का पात्र बनता है, मिट्टी का अंश होता है और जिन अवयवों से पात्र बना रहता है वे भी मिट्टी के होते हैं। जैसी कि श्रुतिमन्त्र से पुष्टि होती है—यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते, येन जातानि जीवन्ति। यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति। प्रत्येक वस्तु का मूल कारण भगवान् है और संहार होने पर प्रत्येक वस्तु उन्हीं में प्रविष्ट होती है (प्रकृतिं यान्ति मामिकाम् ) इस तरह परमेश्वर—भगवान् रामचन्द्र या भगवान् कृष्ण—हर वस्तु के मूल कारण हैं—
ईश्वर: परम: कृष्ण: सच्चिदानन्दविग्रह:।

अनादिरादिर्गोविन्द: सर्वकारणकारणम् ॥

“गोविन्द नाम से प्रसिद्ध कृष्ण परमनियन्ता हैं। उनका शरीर नित्य, आनन्दमय तथा आध्यात्मिक है। वे सबों के उद्गम हैं। उनका कोई अन्य उद्गम नहीं है क्योंकि वे समस्त कारणों के मूल कारण हैं (ब्रह्मसंहिता ५.१)।” भगवान् हर वस्तु के कारण हैं, किन्तु उनका कोई कारण नहीं है। सर्वं खल्विदं ब्रह्म। मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थित:। यद्यपि भगवान् सब कुछ हैं, किन्तु उनका व्यक्तित्व विराट विश्व से पृथक् है।

____________________________
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥