श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 3: गजेन्द्र की समर्पण-स्तुति  »  श्लोक 30

 
श्लोक
श्रीशुक उवाच
एवं गजेन्द्रमुपवर्णितनिर्विशेषं
ब्रह्मादयो विविधलिङ्गभिदाभिमाना: ।
नैते यदोपससृपुर्निखिलात्मकत्वात्
तत्राखिलामरमयो हरिराविरासीत् ॥ ३० ॥
 
शब्दार्थ
श्री-शुक: उवाच—श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; एवम्—इस प्रकार; गजेन्द्रम्—गजेन्द्र को; उपवर्णित—जिसका वर्णन; निर्विशेषम्—किसी विशेष व्यक्ति के लिए न होकर (किन्तु ब्रह्म के लिए यद्यपि वह यह नहीं जानता था कि ब्रह्म कौन है); ब्रह्मा-आदय:—ब्रह्मा, शिव, इन्द्र तथा चन्द्र जैसे देवता; विविध—नाना प्रकार के; लिङ्ग-भिदा—पृथक्-पृथक् स्वरूपों से; अभिमाना:—अपने को पृथक् सत्ता मानते हुए; न—नहीं; एते—सभी; यदा—जब; उपससृपु:—पास आया; निखिल- आत्मकत्वात्—भगवान् के हरएक के परमात्मा होने से; तत्र—वहाँ; अखिल—ब्रह्माण्ड का; अमर-मय:—देवताओं से युक्त (जो शरीर के केवल बाहरी अंग हैं); हरि:—भगवान्, जो हर वस्तु का हरण कर सकते हैं; आविरासीत्—प्रकट हुआ (हाथी के समक्ष) ।.
 
अनुवाद
 
 श्री शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा : जब गजेन्द्र किसी व्यक्ति विशेष का नाम न लेकर परम पुरुष का वर्णन कर रहा था, तो उसने ब्रह्मा, शिव, इन्द्र, चन्द्र इत्यादि देवताओं का आह्वान नहीं किया। अतएव इनमें से कोई भी उसके पास नहीं आये। किन्तु चूँकि भगवान् हरि परमात्मा, पुरुषोत्तम हैं अतएव वे गजेन्द्र के समक्ष प्रकट हुए।
 
तात्पर्य
 गजेन्द्र के वर्णन से लग रहा है कि वह किसी परम सत्ता को लक्ष्य कर रहा था, यद्यपि उसे यह कोई पता न था कि यह परम सत्ता कौन है। उसने अटकल लगाई “ऐसी कोई परम सत्ता अवश्य है, जो सबों से ऊपर है।” ऐसी स्थिति में भगवान् के विविध अंशों ने यथा ब्रह्मा, शिव, इन्द्र, चन्द्र इत्यादि ने सोचा कि यह तो सहायता के लिए हमें नहीं बुला रहा, यह तो उस ब्रह्म को बुला रहा है; जो हम सबों के ऊपर हैं। जैसाकि गजेन्द्र ने वर्णन किया है, भगवान् के विविध अंश हैं जिनमें देवता, मनुष्य तथा पशु सम्मिलित हैं, जो विभिन्न रूपों से आच्छादित हैं। यद्यपि देवताओं के जिम्मे ब्रह्माण्ड के विविध भागों की देखभाल का उत्तरदायित्व है, किन्तु गजेन्द्र ने सोचा कि ये सब उसकी रक्षा कर पाने में असमर्थ हैं। हरिं विना नैव मृतिं तरन्ति—कोई भी व्यक्ति किसी को जन्म, मृत्यु, जरा तथा व्याधि के संकट से बचा नहीं सकता। केवल भगवान् ही संसार के खतरों से रक्षा कर सकते हैं। अतएव इस भयानक संसारी से मुक्त होने के लिए बुद्धिमान् व्यक्ति भगवान् के पास जाता है, किसी देवता के पास नहीं। जैसाकि भगवद्गीता (७.२०) में पुष्टि की गई है—कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञाना: प्रपद्यन्तेऽन्यदेवता:—जो लोग अज्ञानी हैं, वे क्षणिक भौतिक लाभ के लिए विभिन्न देवताओं के पास जाते हैं, किन्तु वास्तविकता तो यह है कि ये देवता जीव को भौतिक संसार के खतरों से बचा नहीं सकते। अन्य जीवों की तरह देवता भी भगवान् के दिव्य शरीर के बाह्य अंग मात्र हैं। जैसाकि वैदिक मंत्रों में कहा गया है—स आत्मा अङ्गान्यन्या देवता:। शरीर के भीतर आत्मा रहता है और शरीर के विभिन्न भाग यथा हाथ-पाँव बाह्य हैं। इसी प्रकार समग्र विश्व की आत्मा नारायण या भगवान् विष्णु हैं और सारे देवता, मनुष्य तथा अन्य जीव उनके शरीर के अंग हैं।
यह भी निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि चूँकि वृक्ष अपनी जड़ों के बल पर जीवित रहता है और जब जड़ों को पानी दिया जाता है, तो वृक्ष के सारे अंगों को भोजन मिल जाता है उसी तरह मनुष्य को चाहिए कि वह भगवान् की वह पूजा करे जो सबों के आदि मूल हैं। यद्यपि भगवान् के पास तक पहुँचना अत्यन्त कठिन है, किन्तु वे हमारे अत्यन्त समीप रहते हैं क्योंकि उनका वास हमारे हृदयों में होता है। ज्योंही भगवान् यह समझ लेते हैं कि कोई मनुष्य पूर्णतया उनकी शरण में आकर कृपायाचना कर रहा है त्योंही वे तुरन्त कार्यवाही करते हैं। फलत: गजेन्द्र की रक्षा करने के लिए यद्यपि देवता नहीं आये किन्तु उसकी भावप्रवण स्तुति के कारण भगवान् तुरन्त ही उसके समक्ष प्रकट हुए। इसका अर्थ यह नहीं है कि देवता गजेन्द्र से अप्रसन्न थे बल्कि वास्तव में जब विष्णु की पूजा की जाती है, तो अन्य सारे देवताओं की भी पूजा हो जाती है। यस्मिन् तुष्टे जगत् तुष्टम्—यदि भगवान् प्रसन्न हैं, तो सभी प्रसन्न हैं।

यथा तरोर्मूलनिषेचनेन तृप्यन्ति तत्स्कन्धभुजोपशाखा:।

प्राणोपहाराच्च यथेन्द्रियाणां तथैव सर्वार्हणमच्युतेज्या ॥

“जिस प्रकार वृक्ष की जड़ में पानी डालने से तना, शाखाएँ तथा अन्य सभी भाग ऊर्जित हो उठते हैं, जिस प्रकार उदर में भोजन के पहुँचने से इन्द्रियाँ तथा शरीर के अंग चैतन्य हो उठते हैं उसी प्रकार भक्ति द्वारा भगवान् की पूजा करने से भगवान् के अंश रूप देवता स्वत: संतुष्ट हो जाते हैं। (भागवत ४.३१.१४)। जब भगवान् की पूजा की जाती है, तो सारे देवता तुष्ट हो जाते हैं।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥