श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 3: गजेन्द्र की समर्पण-स्तुति  »  श्लोक 5

 
श्लोक
कालेन पञ्चत्वमितेषु कृत्स्‍नशो
लोकेषु पालेषु च सर्वहेतुषु ।
तमस्तदासीद् गहनं गभीरं
यस्तस्य पारेऽभिविराजते विभु: ॥ ५ ॥
 
शब्दार्थ
कालेन—कालान्तर में (लाखों वर्ष बाद); पञ्चत्वम्—जब प्रत्येक मायावी वस्तु विनष्ट हो जाती है; इतेषु—सारे विकार; कृत्स्नश:—इस दृश्य जगत के भीतर की प्रत्येक वस्तु सहित; लोकेषु—सारे लोकों में, या इनमें स्थित हर वस्तु में; पालेषु— ब्रह्मा जैसे पालनकर्ताओं में; च—भी; सर्व-हेतुषु—सारे कारणों में; तम:—महान् अंधकार; तदा—तब; आसीत्—था; गहनम्—अत्यन्त घना; गभीरम्—अत्यन्त गहरा; य:—जो भगवान्; तस्य—इस अंधकारपूर्ण स्थिति के; पारे—इसके अतिरिक्त; अभिविराजते—स्थित है या चमकता है; विभु:—परमेश्वर ।.
 
अनुवाद
 
 कालक्रम से जब लोकों तथा उनके निदेशकों एवं पालकों समेत ब्रह्माण्ड के सारे कार्य- कारणों का संहार हो जाता है, तो गहन अंधकार की स्थिति आती है। किन्तु इस अंधकार के ऊपर भगवान् रहता है। मैं उनके चरणकमलों की शरण ग्रहण करता हूँ।
 
तात्पर्य
 वैदिक मंत्रों से हमें पता चलता है कि भगवान् सबों के ऊपर हैं। वे ब्रह्मा तथा शिव समेत समस्त देवताओं से ऊपर सर्वश्रेष्ठ हैं। वे परम नियन्ता हैं। जब उनकी शक्ति से हर वस्तु अदृश्य हो जाती है, तो विराट जगत में घना अंधकार छा जाता है। किन्तु भगवान् सूर्य-प्रकाश हैं जैसी कि वैदिक मंत्रों
में पुष्टि हुई है—आदित्यवर्णं तमस: परस्तात्। हमारा दैनिक अनुभव है कि जब हम इस धरती पर रात्रि के अंधकार में होते हैं, तो सूर्य आकाश में कहीं न कहीं सदैव चमकता रहता है। इसी प्रकार भगवान् परम सूर्य की भाँति सदैव चमकते रहते हैं, तब भी जब कालक्रम से समग्र विराट जगत विनष्ट हो जाता है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥