श्रीमद् भागवतम
शब्द आकार

भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 4: गजेन्द्र का वैकुण्ठ गमन  »  श्लोक 10

 
श्लोक
तस्मा इमं शापमदादसाधु-
रयं दुरात्माकृतबुद्धिरद्य ।
विप्रावमन्ता विशतां तमिस्रं
यथा गज: स्तब्धमति: स एव ॥ १० ॥
 
शब्दार्थ
तस्मै—महाराज इन्द्रद्युम्न को; इमम्—यह; शापम्—शाप; अदात्—दे डाला; असाधु:—अभद्र; अयम्—यह; दुरात्मा—नीच व्यक्ति; अकृत—अशिक्षित; बुद्धि:—उसकी बुद्धि; अद्य—अब; विप्र—ब्राह्मण का; अवमन्ता—अपमान करने वाला; विशताम्—प्रवेश करे; तमिस्रम्—अंधकार में; यथा—जिस तरह; गज:—एक हाथी; स्तब्ध-मति:—कुन्द बुद्धि वाला; स:— वह; एव—निस्सन्देह ।.
 
अनुवाद
 
 तब अगस्त्य मुनि ने राजा को यह शाप दे डाला—“इन्द्रद्युम्न तनिक भी भद्र नहीं है। नीच तथा अशिक्षित होने के कारण इसने ब्राह्मण का अपमान किया है। अतएव यह अंधकार प्रदेश में प्रवेश करे और आलसी मूक हाथी का शरीर प्राप्त करे।”
 
तात्पर्य
 हाथी अत्यन्त बलिष्ठ होता है, उसका शरीर अत्यन्त भारी होता है, वह कठोर श्रम कर सकता है और प्रचुर भोजन खा सकता है; फिर भी उसकी बुद्धि उसके आकार तथा बल के अनुरूप नहीं होती। इस तरह इतनी शारीरिक शक्ति होते हुए भी वह मनुष्य का चाकर बनकर काम करता है। अगस्त्य मुनि ने यही ठीक समझा कि इस राजा को हाथी बनने का शाप दिया जाये क्योंकि इस शक्तिशाली राजा ने मेरा स्वागत उस रूप में नहीं
किया जैसा कि ब्राह्मण का होना चाहिए। यद्यपि अगस्त्य मुनि ने महाराज इन्द्रद्युम्न को हाथी बनने का शाप दे डाला, किन्तु यह शाप अप्रत्यक्ष: वरदान था क्योंकि हाथी का जीवन बिताने से उसके पूर्वजन्म के पापों के सारे फल समाप्त हो गये। हाथी जीवन का अन्त होते ही वह भगवान् जैसा शरीर पाकर उनका पार्षद बनने के लिए वैकुण्ठ लोक भेज दिया गया। यह सारूप्य-मुक्ति कहलाती है।
____________________________
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥