श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 4: गजेन्द्र का वैकुण्ठ गमन  »  श्लोक 13

 
श्लोक
एवं विमोक्ष्य गजयूथपमब्जनाभ-
स्तेनापि पार्षदगतिं गमितेन युक्त: ।
गन्धर्वसिद्धविबुधैरुपगीयमान-
कर्माद्भ‍ुतं स्वभवनं गरुडासनोऽगात् ॥ १३ ॥
 
शब्दार्थ
एवम्—इस प्रकार; विमोक्ष्य—उद्धार करके; गज-यूथ-पम्—हाथियों के राजा, गजेन्द्र को; अब्ज-नाभ:—भगवान् जिनकी नाभि से कमल निकलता है; तेन—उसके (गजेन्द्र) द्वारा; अपि—भी; पार्षद-गतिम्—भगवान् के पार्षद का पद; गमितेन— पहले से प्राप्त; युक्त:—के साथ-साथ; गन्धर्व—गन्धर्व लोक के निवासी; सिद्ध—सिद्ध लोक के निवासी; विबुधै:—तथा बड़े-बड़े ऋषि मुनियों के द्वारा; उपगीयमान—महिमामंडित होकर; कर्म—जिसके कार्यकलाप; अद्भुतम्—आश्चर्यजनक; स्व भवनम्—अपने धाम को; गरुड-आसन:—गरुड़ पर आसीन होकर; अगात्—लौट गये ।.
 
अनुवाद
 
 गजेन्द्र को घडिय़ाल के चंगुल से तथा इस भौतिक संसार से जो घडिय़ाल जैसा लगता है। घडिय़ाल जैसे ही इस भौतिक जगत छुड़ाकर भगवान् ने उसे सारूप्य मुक्ति प्रदान की। भगवान् के अद्भुत दिव्य कार्यकलापों का यश बखान करने वाले गन्धर्वों, सिद्धों तथा अन्य देवताओं की उपस्थिति में, भगवान् अपने वाहन गरुड़ की पीठ पर बैठकर अपने अद्भुत धाम को लौट गये और अपने साथ गजेन्द्र को भी लेते गये।
 
तात्पर्य
 इस श्लोक में विमोक्ष्य शब्द महत्त्वपूर्ण है। भक्त के लिए मोक्ष या मुक्ति का अर्थ है भगवान् के पार्षद का पद प्राप्त करना। निर्विशेषवादी ब्रह्म ज्योति में तल्लीन होने की मुक्ति से ही संतुष्ट रहते हैं, किन्तु भक्त के लिए मुक्ति का अर्थ भगवान् के तेज में तल्लीन होना नहीं, अपितु वैकुण्ठ लोक जाकर भगवान् का पार्षद बनना है। इस सम्बन्ध में श्रीमद्भागवत (१०.१४.८) में एक श्लोक है—
तत्तेऽनुकम्पां सुसमीक्षमाणो भुञ्जान एवात्मकृतं विपाकम्।

हृद्वाग्वपुर्भिर्विदधन्नमस्ते जीवेत यो मुक्तिपदे स दायभाक् ॥

“जो आपकी कृपा का इच्छुक है और इस तरह अपने विगत कर्मों के फल के कारण सभी विषम परिस्थितियों को सह लेता है, जो मन, वाणी तथा शरीर से आपकी भक्ति में सदा लगा रहता है और सदैव आपको नमस्कार करता है, वह निश्चय ही मुक्ति का योग्य पात्र है।” जो भक्त इस भौतिक जगत में सब कुछ सहकर धैर्यपूर्वक भक्ति करता है, वह मुक्तिपदे स दायभाक् अर्थात् मुक्ति का प्रामाणिक पात्र होता है। दायभाक् शब्द भगवान् की कृपा के उत्तराधिकार को बताता है। भक्त को सांसारिक परिस्थितियों की परवाह न करके एकमात्र भक्ति में लगे रहना चाहिए। तब वह वैकुण्ठ लोक जाने का स्वत: अधिकारी बन जाता है। जो भक्त भगवान् की अनन्य भक्ति करता है उसे वैकुण्ठ लोक जाने का उसी तरह अधिकार प्राप्त होता है, जिस प्रकार पुत्र को अपने पिता की सम्पत्ति का उत्तराधिकार प्राप्त होता है।

जब कोई भक्त मुक्ति पाता है, तो वह भौतिक कल्मष से छूट जाता है और भगवान् का दास नियुक्त हो जाता है। इसकी व्याख्या श्रीमद्भागवत (२.१०.६) में की गई है—मुक्तिर्हित्वान्यथा रूपं स्वरूपेण व्यवस्थिति:। स्वरूप शब्द सारूप्य मुक्ति का सूचक है, जिसका अर्थ है भगवान् के धाम को वापस जाना और भगवान् के ही समान चतुर्भुजी आध्यात्मिक शरीर प्राप्त करके, जो शंख, चक्र, गदा तथा पद्म धारण किये रहता है भगवान् का नित्य पार्षद बने रहना। निर्विशेषवादी तथा भक्त की मुक्ति में यही अन्तर है कि भक्त तुरन्त ही भगवान् का नित्य दास नियुक्त हो जाता है, जबकि निर्विशेषवादी ब्रह्मज्योति में विलीन होकर भी असुरक्षित रहता है और सामान्यत: इस भौतिक जगत में फिर गिर जाता है। आरुह्य कृच्छ्रेण परं पदं तत: पतन्त्यधोऽनादृत युष्मदङ्घ्रय: (भागवत १०.२.३२)। यद्यपि निर्विशेषवादी, ब्रह्मज्योति तक उठकर, उसी में प्रवेश कर जाता है, किन्तु भगवान् की सेवा में न लगा होने के कारण पुन: भौतिकतावादी परोपकारी कार्यों के प्रति आकृष्ट होता है। इस तरह वह अस्पताल तथा शैक्षणिक संस्थान खोलने, गरीबों को भोजन कराने तथा इसी प्रकार की सांसारिक गतिविधियाँ सम्पन्न करने के लिए नीचे आता है जिन्हें वह भगवान् की सेवा करने की अपेक्षा अधिक मूल्यवान समझता है। अनादृतयुष्मदङ्घ्रय:। निर्विशेषवादी यह नहीं सोचते कि भगवान् की सेवा करना गरीब की सेवा करने या स्कूल अथवा अस्पताल खोलने की अपेक्षा अधिक मूल्यवान है। यद्यपि वे यह कहते हैं कि ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या—अर्थात् ब्रह्म सत्य है और भौतिक जगत मिथ्या है—तो भी वे इस मिथ्या जगत की सेवा करने के अत्यन्त इच्छुक रहते हैं और भगवान् के चरणकमलों की सेवा की उपेक्षा करते हैं।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥