श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 8: ब्रह्माण्डीय सृष्टि का निवर्तन  »  अध्याय 4: गजेन्द्र का वैकुण्ठ गमन  »  श्लोक 17-24

 
श्लोक
श्रीभगवानुवाच
ये मां त्वां च सरश्चेदं गिरिकन्दरकाननम् ।
वेत्रकीचकवेणूनां गुल्मानि सुरपादपान् ॥ १७ ॥
श‍ृङ्गाणीमानि धिष्ण्यानि ब्रह्मणो मे शिवस्य च ।
क्षीरोदं मे प्रियं धाम श्वेतद्वीपं च भास्वरम् ॥ १८ ॥
श्रीवत्सं कौस्तुभं मालां गदां कौमोदकीं मम ।
सुदर्शनं पाञ्चजन्यं सुपर्णं पतगेश्वरम् ॥ १९ ॥
शेषं च मत्कलां सूक्ष्मां श्रियं देवीं मदाश्रयाम् ।
ब्रह्माणं नारदमृषिं भवं प्रह्लादमेव च ॥ २० ॥
मत्स्यकूर्मवराहाद्यैरवतारै: कृतानि मे ।
कर्माण्यनन्तपुण्यानि सूर्यं सोमं हुताशनम् ॥ २१ ॥
प्रणवं सत्यमव्यक्तं गोविप्रान् धर्ममव्ययम् ।
दाक्षायणीर्धर्मपत्नी: सोमकश्यपयोरपि ॥ २२ ॥
गङ्गां सरस्वतीं नन्दां कालिन्दीं सितवारणम् ।
ध्रुवं ब्रह्मऋषीन्सप्त पुण्यश्लोकांश्च मानवान् ॥ २३ ॥
उत्थायापररात्रान्ते प्रयता: सुसमाहिता: ।
स्मरन्ति मम रूपाणि मुच्यन्ते तेꣷहसोऽखिलात् ॥ २४ ॥
 
शब्दार्थ
श्री-भगवान् उवाच—भगवान् ने कहा; ये—जो; माम्—मुझको; त्वाम्—तुमको; च—भी; सर:—झील, तालाब; च—भी; इदम्—यह; गिरि—(त्रिकूट) पर्वत; कन्दर—गुफाएँ; काननम्—उद्यान; वेत्र—बेंत; कीचक—खोखला बाँस; वेणूनाम्— अन्य प्रकार के बाँस के; गुल्मानि—समूह, कुंज; सुर-पादपान्—स्वर्गिक वृक्ष; शृङ्गाणि—चोटियाँ; इमानि—ये; धिष्ण्यानि— घर, धाम; ब्रह्मण:—ब्रह्मा को; मे—मेरा; शिवस्य—शिव का; च—भी; क्षीर-उदम्—दुग्धसागर; मे—मेरा; प्रियम्—अत्यन्त प्रिय; धाम—स्थान; श्वेत-द्वीपम्—श्वेत द्वीप नामक; च—भी; भास्वरम्—आध्यात्मिक किरणों से सदैव चमचमाता; श्रीवत्सम्—श्रीवत्स नामक चिह्न; कौस्तुभम्—कौस्तुभ मणि; मालाम्—माला; गदाम्—गदा; कौमोदकीम्—कौमोदकी नामक; मम—मेरा; सुदर्शनम्—सुदर्शन चक्र; पाञ्चजन्यम्—पाञ्चजन्य नामक शंख; सुपर्णम्—गरुड़; पतग-ईश्वरम्—पक्षी राज; शेषम्—शेष नाग नामक आसन; च—तथा; मत्-कलाम्—मेरा अंश; सूक्ष्माम्—अत्यन्त सूक्ष्म; श्रियम् देवीम्—सम्पत्ति की देवी को; मत्-आश्रयाम्—मुझ पर आश्रित; ब्रह्माणम्—ब्रह्माजी को; नारदम् ऋषिम्—नारद ऋषि को; भवम्—शिवजी को; प्रह्रादम् एव च—तथा प्रह्लाद को भी; मत्स्य—मत्स्य अवतार; कूर्म—कूर्म अवतार; वराह—वराह अवतार; आद्यै:—आदि; अवतारै:—विभिन्न अवतारों के द्वारा; कृतानि—किये गये; मे—मेरे; कर्माणि—कार्यकलाप; अनन्त—असीम; पुण्यानि—शुभ, पवित्र; सूर्यम्—सूर्यदेव को; सोमम्—चन्द्र देव को; हुताशनम्—अग्निदेव को; प्रणवम्—ओंकार मंत्र को; सत्यम्—परम सत्य को; अव्यक्तम्—सम्पूर्ण भौतिकशक्ति को; गो-विप्रान्—गायों तथा ब्राह्मणों को; धर्मम्—भक्ति को; अव्ययम्—अव्यय; दाक्षायणी:—दक्ष की पुत्रियाँ; धर्म-पत्नी:—वैध्य पत्नियाँ; सोम—चन्द्र देव की; कश्यपयो:—तथा कश्यप ऋषि की; अपि— भी; गङ्गाम्—गंगा नदी को; सरस्वतीम्—सरस्वती नदी को; नन्दाम्—नन्दा नदी को; कालिन्दीम्—यमुना नदी को; सित वारणम्—ऐरावत हाथी को; ध्रुवम्—ध्रुव महाराज को; ब्रह्म-ऋषीन्—बड़े-बड़े ऋषियों को; सप्त—सात; पुण्य-श्लोकान्— अत्यन्त पवित्र; च—तथा; मानवान्—मनुष्यों को; उत्थाय—उठकर; अपर-रात्र-अन्ते—रात्रि के अन्त में; प्रयता:—अत्यन्त सतर्क रहकर; सु-समाहिता:—एकाग्र चित्त से; स्मरन्ति—स्मरण करते हैं; मम—मेरे; रूपाणि—रूपों को; मुच्यन्ते—छूट जाते हैं; ते—ऐसे पुरुष; अंहस:—पापकर्मों के फल से; अखिलात्—सभी प्रकार के ।.
 
अनुवाद
 
 भगवान् ने कहा : समस्त पापपूर्ण कर्मों के फलों से ऐसे व्यक्ति मुक्त हो जाते हैं, जो रात्रि बीतने पर प्रात:काल ही जग जाते हैं, अत्यन्त ध्यानपूर्वक अपने मनों को मेरे रूप, तुम्हारे रूप, इस सरोवर, इस पर्वत, कन्दराओं, उपवनों, बेंत के वृक्षों, बाँस के वृक्षों, कल्पतरु, मेरे, ब्रह्मा तथा शिव के निवास स्थानों, सोना, चाँदी तथा लोहे से बनी त्रिकूट पर्वत की तीन चोटियों, मेरे सुहावने धाम (क्षीरसागर), आध्यात्मिक किरणों से नित्य चमचमाते श्वेत द्वीप, मेरे चिन्ह श्रीवत्स, कौस्तुभ मणि, मेरी वैजयन्ती माला, कौमोदकी नामक मेरी गदा, मेरे सुदर्शन चक्र, तथा पाञ्चजन्य शंख, मेरे वाहन पक्षीराज गरुड़, मेरी शय्या शेषनाग, मेरी शक्ति का अंश लक्ष्मीजी, ब्रह्मा, नारद मुनि, शिवजी, प्रह्लाद, मेरे सारे अवतारों यथा मत्स्य, कूर्म तथा वराह, मेरे अनन्त शुभ कार्यकलापों में जो सुनने वाले को पवित्रता प्रदान करते हैं, मेरे सूर्य, चन्द्रमा, अग्नि, ओङ्कार मंत्र, परम सत्य, समग्र भौतिक शक्तियों, गायों तथा ब्राह्मणों में, भक्ति, सोम तथा कश्यप की पत्नियों में जो राजा दक्ष की पुत्रियाँ हैं, गंगा, सरस्वती, नन्दा तथा यमुना नदियों, ऐरावत हाथी, ध्रुव महाराज, सप्तर्षि तथा पवित्र मनुओं में एकाग्र करते हैं।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥